सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में अधिसूचित सूचना का अधिकार (RTI) नियम, 2026 में शामिल एक विवादित प्रावधान को इसके लागू होने के महज एक सप्ताह बाद वापस ले लिया है। पारदर्शिता कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज समूहों की व्यापक आलोचना के बाद सरकार ने यह कदम उठाया। अब निरस्त किए गए इस प्रावधान में नागरिकों से RTI Act के तहत जानकारी मांगने का उद्देश्य बताना अनिवार्य किया गया था। कई लोगों का कहना था कि यह कदम इस ऐतिहासिक पारदर्शिता कानून की भावना और कानूनी ढांचे के विपरीत है।
इस प्रावधान को लेकर आशंका जताई गई थी कि आवेदकों को अनावश्यक जांच-परख का सामना करना पड़ सकता है, जिससे व्हिसलब्लोअर और आम नागरिक सरकारी सूचना तक पहुंच के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित हो सकते हैं। आलोचकों ने चेतावनी दी थी कि आवेदकों को अपने उद्देश्य का खुलासा करने के लिए बाध्य करना पारदर्शिता को कमजोर कर सकता है और अनुरोधों को मनमाने ढंग से खारिज करने की गुंजाइश पैदा कर सकता है।
सरकार के इस त्वरित यू-टर्न ने संशोधित RTI ढांचे के मसौदा तैयार करने और उसकी कानूनी जांच-परख की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। व्यापक RTI Rules, 2026 पहले ही आवेदन और अपील शुल्क बढ़ाने, नागरिकता का अनिवार्य प्रमाण मांगने और आवेदन के प्रारूप पर पाबंदियां लगाने जैसे प्रावधानों को लेकर आलोचना झेल चुके थे। पारदर्शिता के पक्षधर कार्यकर्ताओं का तर्क था कि इन बदलावों से नागरिकों के लिए सूचना तक पहुंच अधिक कठिन और महंगी हो सकती है।
उद्देश्य बताने वाली शर्त को वापस लिया जाना RTI कार्यकर्ताओं और खुली तथा जवाबदेह शासन व्यवस्था के समर्थकों की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह सिद्धांत फिर मजबूत हुआ है कि जानकारी मांगने के लिए नागरिकों को अपने कारण बताने की जरूरत नहीं है।
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