आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : राजस्थान में साल 2023 अशोक गहलोत के बाद वसुंधरा राजे और वसुंधरा राजे के बाद अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के रिवाज को तोड़ने वाला रहा। ये साल प्रदेश नेतृत्व में परिवर्तन की बड़ी घटना के लिए बरसों याद किया जाएगा।
भाजपा ने राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए नए चेहरे भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री की कमान सौंपी। BJP आलाकमान ने कई ऐसे फैसले कर वसुंधरा राजे को CM की कुर्सी से दूर करने के संकेत दे दिए थे। असल में इसकी कहानी करीब 9 महीने पहले लिखी गई थी।
इस रिपोर्ट में पढ़िए- वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर करने की राजस्थान की राजनीति की सबसे बड़ी व चर्चित घटना की इनसाइड स्टोरी…
RSS की कुछ शर्तें और ‘खुफिया’ तीन सर्वे, जो राजे को पड़े भारी
भाजपा आलाकमान ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 10 फरवरी को आए आखिरी लोकलुभावन बजट के बाद से ही सर्वे शुरू कर दिए थे और RSS के मन को टटोलना भी। भाजपा ने एक गुपचुप में सर्वे भी चलाया और रेंडमली हर विधानसभा के कुछ लोगों से पूछा गया कि वे राजे को CM देखना चाहते हैं कि नहीं।
सर्वे में बजट के पेश होने के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच बराबर टक्कर होने का माहौल बन गया था, लेकिन जनता ने गहलोत और राजे के राजनीतिक कार्यकाल को लेकर कोफ्त जताई थी। सर्वे से पता चला था कि गहलोत और राजे के राज से लोग ऊब चुके हैं।
वहीं, RSS ने भी विधानसभा चुनाव 2018 का हवाला देते हुए राजे को CM चेहरा बनाने से दूर रखने की राय रख दी थी। RSS ने साफ कहा था कि यदि राजे को ही खुलकर CM पद का दावेदार घोषित कर दिया तो भाजपा की राह मुश्किल हो जाएगी। उनकी राय थी गहलोत और राजे के राज को जनता 25 सालों से देख भी रही है, अब परंपरा बदलने का समय है।
भाजपा ने बजट के बाद फिर टिकट वितरण से पहले और बाद में भी सर्वे किए थे। पता लगाने का प्रयास किया था कि किन सीटों पर स्थिति नाजुक है। टिकट वितरण के बाद मतदान से पहले हुए सर्वे में जिन सीटों पर स्थिति टाइट थी, उन्हें आगाह भी कर दिया गया था। ऐसी सीटों में नेता प्रतिपक्ष रहे राजेंद्र राठौड़ और उपनेता प्रतिपक्ष रहे सतीश पूनिया की सीट भी शामिल थी। इस सर्वे में भाजपा को बिना CM चेहरे के भी बहुमत मिलने का इशारा मिल गया था।
आलाकमान ने राजे गुट की बात तो सुनी, लेकिन मानी नहीं
भाजपा आलाकमान को मालूम था कि प्रदेश में भाजपा गुटों में बंट गई है। मार्च से पहले प्रदेश अध्यक्ष रहते सतीश पूनिया और वसुंधरा राजे के बीच बन नहीं रही थी। पूनिया का अध्यक्ष रहते कार्यकाल पूरा होने के बाद राजे गुट लगातार हटाने के प्रयास में जुटा हुआ था।