सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : अमेरिका की यूरोपीय सुरक्षा नीति को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जर्मनी में लंबी दूरी की अमेरिकी मिसाइलों की प्रस्तावित तैनाती को लेकर संकेत मिल रहे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस योजना पर पुनर्विचार कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल एक सैन्य फैसला नहीं होगा, बल्कि रूस, नाटो और यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था पर दूरगामी असर डालने वाला कदम साबित हो सकता है।
पिछले वर्ष अमेरिका और जर्मनी के बीच हुए समझौते के तहत वर्ष 2026 से जर्मनी में अत्याधुनिक लंबी दूरी की मिसाइलों की तैनाती की योजना बनाई गई थी। इस योजना को यूरोप की सुरक्षा मजबूत करने और रूस के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने की रणनीति के रूप में देखा गया था।
क्या थी मिसाइल तैनाती योजना?
योजना के अनुसार अमेरिका जर्मनी में टॉमहॉक क्रूज मिसाइल, एसएम-6 मिसाइल और अन्य आधुनिक लंबी दूरी के हथियार तैनात करने वाला था। इन हथियारों की क्षमता यूरोप की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करने और संभावित खतरों का मुकाबला करने की मानी जा रही थी।
विशेषज्ञों का कहना था कि यह कदम शीत युद्ध के बाद यूरोप में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को नया आयाम देता। नाटो देशों ने भी इसे सामूहिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना था।
रूस ने शुरू से किया था विरोध
रूस ने इस योजना का लगातार विरोध किया। मॉस्को का आरोप था कि जर्मनी में अमेरिकी मिसाइलों की तैनाती उसके राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के खिलाफ है। रूस ने चेतावनी दी थी कि यदि अमेरिका यह कदम उठाता है तो वह भी जवाबी सैन्य तैयारी करेगा।
रूसी नेतृत्व ने इसे यूरोप में हथियारों की नई होड़ की शुरुआत बताया था। कई विश्लेषकों का मानना है कि रूस की कड़ी प्रतिक्रिया ने अमेरिका के भीतर भी इस योजना को लेकर नई बहस को जन्म दिया।
ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा है पुनर्विचार?
अमेरिकी नीति विशेषज्ञों के अनुसार ट्रंप प्रशासन वैश्विक सुरक्षा प्राथमिकताओं की समीक्षा कर रहा है। रूस के साथ बढ़ते तनाव, रक्षा खर्च के पुनर्मूल्यांकन और सैन्य संसाधनों के पुनर्वितरण जैसे कारणों को इस फैसले के पीछे माना जा रहा है।
कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका यूरोप में सैन्य प्रतिबद्धताओं को सीमित कर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना चाहता है। ऐसे में जर्मनी में मिसाइल तैनाती की योजना पर दोबारा विचार किया जा रहा है।
जर्मनी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह योजना?
जर्मनी लंबे समय से यूरोप की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। जर्मन नेतृत्व का मानना है कि आधुनिक मिसाइल प्रणाली की तैनाती से यूरोप की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी और किसी भी संभावित सैन्य खतरे का प्रभावी जवाब दिया जा सकेगा।
यदि अमेरिका इस योजना से पीछे हटता है तो जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
नाटो देशों में बढ़ी चिंता
नाटो के कई सदस्य देशों को आशंका है कि अमेरिका का बदला हुआ रुख गठबंधन की सामूहिक सुरक्षा नीति को प्रभावित कर सकता है। यूरोप के कई देशों का मानना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद सुरक्षा चुनौतियां पहले से कहीं अधिक बढ़ गई हैं।
ऐसे समय में यदि अमेरिका मिसाइल तैनाती जैसी महत्वपूर्ण योजना को रोकता है तो इससे रूस को रणनीतिक लाभ मिल सकता है।
यूरोप को खुद मजबूत करनी पड़ सकती है सैन्य क्षमता
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका पीछे हटता है तो यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा क्षमताओं में अधिक निवेश करना होगा। फ्रांस, जर्मनी और अन्य देशों द्वारा स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रमों तथा रक्षा परियोजनाओं पर जोर बढ़ सकता है।
यह घटनाक्रम यूरोप को सुरक्षा के मामले में अमेरिका पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रेरित कर सकता है।
क्या सचमुच यू-टर्न ले रहे हैं ट्रंप?
हालांकि अभी तक अमेरिका की ओर से इस योजना को पूरी तरह रद्द करने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इसे पूर्ण यू-टर्न कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन जिस तरह से योजना को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है, उससे यह स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन यूरोप में अपनी सैन्य रणनीति का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है।
निष्कर्ष
जर्मनी में अमेरिकी मिसाइल तैनाती योजना पर मंडराते संशय ने यूरोप की सुरक्षा राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। यदि अमेरिका वास्तव में पीछे हटता है तो इसका असर केवल जर्मनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नाटो की सामरिक रणनीति, रूस के साथ शक्ति संतुलन और पूरे यूरोपीय सुरक्षा ढांचे पर दिखाई देगा। आने वाले दिनों में वाशिंगटन का अंतिम फैसला वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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