आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : चार दिन हो गए। भर ठण्ड में मौसम बारिश का चल रहा है। किसान खुश हैं। उन्हें गेहूं, चने में एक बार का पानी फेरने से मुक्ति मिल गई। दूसरी तरफ शहरों में सुबह- शाम कंपकंपी छूट रही है। कोहरा और गलन इतनी है कि बिना बारिश के भी ओलतन टपक रही है। ग़ज़ब की ठण्ड है, लेकिन राजनीतिक चर्चा की गर्मी भी सिर चढ़कर बोल रही है। जिस तरह आसमान में बादलों का डेरा है, उसी तरह पाँच राज्यों के चुनावों का परिणाम भी आशंकाओं के बादलों से घिरा पड़ा है।

एग्जिट पोल आए। कई एजेंसियों ने सर्वे किया, लेकिन इनके बाहर आने से भी बादल छँटे नहीं। बल्कि कहना चाहिए कुछ ज़्यादा ही गहरा गए हैं। लगता है ये बादल 3 दिसंबर से पहले छँटने वाले नहीं हैं। आसमान साफ़ इसी दिन होगा। चर्चा, बहस, लड़ाई, झगड़े, रूठना- मनाना तब तक जारी रहेगा, लेकिन उदास होने की ज़रूरत नहीं है। बस, आज का ही दिन है। चाहे जितने गोते लगा लीजिए। कल सब कुछ साफ़ हो जाना है।

वैसे इतना तो लोग जान ही गए हैं कि तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस काफ़ी मज़बूत रहने वाली है। मामला फँसा हुआ है राजस्थान और मध्यप्रदेश में। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खूब मेहनत की। बहुतेरी मुफ़्त की रेवड़ियां बाँटीं। बहुत सी नई योजनाओं का पास फेंका। फिर भी स्थिति उतनी साफ़ नहीं है जितनी छत्तीसगढ़ में है।

मध्यप्रदेश में भाजपा के खिलाफ बीस साल की एंटी इंकम्बेंसी है, लेकिन फिर भी यहाँ कांग्रेस की साफ़ लहर दिखाई नहीं दे रही है। ख़ैर, चर्चा जारी है और इस चर्चा का कोई अंत नहीं है। कोई पारोवार नहीं है।

हालाँकि, यह बात सोलह आने सच है कि ये जो चुनाव परिणाम को लेकर बहस कर रहे हैं, लड़- झगड़ रहे हैं और लगातार दावे- प्रति दावे कर रहे हैं, किसी भी दल या प्रत्याशी की जीत या हार से इनके जीवन पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है। इनका जीवन वैसा ही रहेगा जैसा पाँच साल पहले था या उसके भी पाँच साल पहले रहा होगा।

लेकिन क्या किया जाए? चर्चा तो करनी है। हमने वोट दिया है तो उसका परिणाम देखना, उसका अंदाज़ा लगाना भी हमारा परम कर्तव्य है। क्यूरिऑसिटी एक शब्द है। हिंदू में हम इसे प्रत्याशा कह सकते हैं। वो तो रहती ही है। … और ये 3 दिसंबर से पहले शांत होने वाली नहीं है। तब तक अंदाज़ा लगाना ही हाथ में रह गया है। सो लगा रहे हैं।