आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : सिक्किम में 4 अक्टूबर को लहोनक झील में बादल फटने से तीस्ता नदी में बाढ़ आई थी। इस हादसे के 60 दिन बीत चुके हैं। अब तक 40 लोगों के शव मिले हैं। 7 जवानों सहित 77 लोग अब भी लापता हैं।
सीएम दफ्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस तबाही से सिक्किम 5 साल पीछे चला गया। 6.90 लाख की आबादी वाले राज्य को 30 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 88 हजार लोग विस्थापित हुए।
15 फीट मलबे में दबा है घर
इस त्रासदी में रंगपो शहर के 24 साल के नसीम अख्तर का परिवार भी लापता हो गया। नसीम ने भास्कर टीम को बताया- 4 अक्टूबर की रात तेज बारिश हो रही थी, तभी उसके दोस्त बाबू ने जोर-जोर से दरवाजा पीटा।
बाबू बोला- जल्दी निकलो, भागो। बाढ़ आ रही है। मैंने घर वालों को जगाया, बाहर देखा कि बाढ़ सब रौंदती चली आ रही है। मैं स्कूटी की तरफ भागा। चाबी लगाकर पीछे देखा तो पापा, भाई, भाभी, बच्चे, बहन घर समेत गायब हो चुके थे। सैलाब सब बहा ले गया।
नसीम अख्तर के भाई, भाभी, बच्चों के शव अब तक नहीं मिले है। तीस्ता नदी के किनारे स्थित नसीम का घर 15 फीट मलबे में दबा है। नसीम ने बताया कि रंगपो से चुंगथांग 49 किमी दूर है। उस रात बाढ़ 20 मिनट में रंगपो पहुंच गई थी।
सेना के कई हथियार बहकर बांग्लादेश पहुंच गए थे
बाढ़ से सबसे ज्यादा तबाही चुंगथांग में हुई। यहां 600 परिवार बसे थे। अभी 80% शहर मलबे में दबा है। सैना के एक अधिकारी ने बताया कि चुंगथांग के ऊपर का इलाका सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।
यहां युगांग में सेना का गोला बारूद डिपो था, जो बहकर बांग्लादेश पहुंच गया था। कुछ ही हथियार रिकवर हो सके। सेना को करीब 1100 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। सेना की गाड़ियां मलबे में दबी हैं। गोला-बारूद, छोटी तोपें, बंदूकें सब बह गए।
चुंगथांग से ऊपर के रास्ते अब भी बंद
चुंगथांग में तैनात बीआरओ के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि सिंगताम से जीरो लाइन तक बने 13 पुल टूट गए। इससे सेना की ऊपर तक आवाजाही बंद हो गई। सिंगताम से ऊपर डिक्चु शहर तक 32 किमी सड़क भी बह गई।
सेना को सबसे ज्यादा नुकसान तुंग पुल टूटने से हुआ। ये पुल अब स्थाई नहीं बन पाएगा। जो अस्थाई पुल है, उस पर 12 टन से ज्यादा भारी गाड़ियां नहीं गुजर सकतीं। संकलांग में बेली ब्रिज बना दिया है, ताकि चुंगथांग जा सकें।
चुंगथांग से ऊपर के सभी रास्ते बंद हैं। तीस्ता किनारे वाले ऊपरी इलाकों में राशन पहुंचाने के लिए फुट ब्रिज बना रहे हैं। जहां सड़कें खत्म हो चुकीं, वहां पहाड़ की कटाई कर नया कच्चा रास्ता निकाल रहे हैं। सेना के लिए दो-तीन महीने में रूट तैयार हो पाएगा।