आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : 16 जून, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का जन्मदिन है और वे इसे जल्दी नहीं भूल पाएंगे, क्योंकि 2020 में इसी दिन 20 साल में पहली बार चीन और उसकी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को सबसे घातक मुठभेड़ का सामना करना पड़ा था।

यह कहना है पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का। नरवणे ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में 2020 में गलवान वैली में भारतीय सेना और चीन की आर्मी के बीच हुई हिंसक झड़प के बारे कई बातें लिखी हैं। उनकी ऑटोबायोग्राफी जनवरी 2024 में लॉन्च होगी।

उन्होंने इस किताब में लिखा है कि चीन ने छोटे पड़ोसियों को डराने-धमकाने के लिए वुल्फ वॉरियर कूटनीति और सलामी-स्लाइसिंग रणनीति अपनाई। लेकिन गलवान में भारतीय सेना ने चीन और दुनिया को दिखा दिया कि बस, अब बहुत हो गया।

जून 2020 में भारतीय सेना और PLA के बीच हुई इस झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे। लेकिन इससे पहले हमारी सेना ने PLA के भी 40 से ज्यादा सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था।

गलवान झड़प के समय नेपाल और भूटान को भी डरा रहा था चीन

नरवणे ने लिखा है कि गलवान झड़प के समय चीन नेपाल और भूटान जैसे छोटे पड़ोसियों को डराने-धमकाने के लिए हर जगह भेड़िया-योद्धा कूटनीति और सलामी-स्लाइसिंग रणनीति अपना रहा था, जबकि दक्षिण चीन सागर में लगातार दावे बढ़ा रहा था।

वुल्फ-वॉरियर डिप्लोमेसी शब्द एक प्रकार की मुखर कूटनीति के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जबकि सलामी स्लाइसिंग एक रणनीति है जिसका इस्तेमाल किसी जमीन के हिस्से को टुकड़े-टुकड़े करके कब्जा करने के लिए किया जाता है।

नरवणे की ऑटोबायोग्राफी में गलवान झड़प की पूरी कहानी…

गलवान घाटी के पेट्रोलिंग प्वाइंट-14 (PP-14) में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने अपने दो टेंट हटाने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद गलवान झड़प शुरू हुई। दुश्मन के इनकार के बाद भारतीय सेना ने उसी जगह अपने टेंट लगाने का फैसला किया था। अब पढ़ें, नरवणे की किताब में लिखी झड़प की पूरी कहानी…

पूर्वी लद्दाख बॉर्डर पर विवाद मई 2020 में शुरू हुआ था। तब PP-15 और PP-17A समेत कई जगहों पर फ्लैग लेवल मीटिंग जारी थीं। इन जगहों पर सैनिक सहमत दूरी पर पीछे हट गए थे, जिससे खूनी संघर्ष की संभावना कम हो गई थी।

हालांकि PP-14 पर, जब भी हमने PLA से तंबू हटाने के लिए कहा, वे अपना रुख बदलते रहे। हमें इसकी जांच करने के लिए कुछ और वक्त की जरूरत थी कि कहीं यह हमारे सीनियर्स की बातचीत के दायरे से बाहर तो नहीं है।

PLA की अकड़ से यह साफ हो गया कि उनका ये टेंट हटाने का कोई इरादा नहीं था। इसका मुकाबला करने के लिए हमने भी उसी जगह अपने तंबू लगाने का फैसला किया। जब भारतीय सेना के जवान टेंट लगाने गए तो चीनी सैनिकों ने हमला कर दिया।

16 बिहार के कमांडिंग ऑफिसर (CO) कर्नल संतोष बाबू ने हालात काबू में करने की कोशिश की। वे सैनिकों की एक छोटी पार्टी के साथ आगे बढ़े, लेकिन चीन की सेना झुकने के मूड में नहीं थी और उन्होंने संतोष बाबू की पार्टी पर भी हमला कर दिया।