आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : तृणमूल कांग्रेस की सांसद। महुआ मोइत्रा। कहते हैं इन्होंने एक बिज़नेसमैन को अपना पासवर्ड दे दिया था और वह महुआ की तरफ़ से अडानी और अन्य के खिलाफ प्रश्न पूछता रहा। कहते हैं कि इसके बदले पैसे भी लिए जाते रहे। लोकसभा की एथिक्स कमेटी जिसे हिंदी में आचार संहिता समिति कहा जाता है, ने महुआ के खिलाफ आरोपों को सही पाया। महुआ का कहना है कि कमेटी ने गहन जाँच नहीं की।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना था कि कमेटी की रिपोर्ट पढ़ने का पर्याप्त टाइम नहीं दिया गया। दोपहर बारह बजे रिपोर्ट पटल पर रखी और दो बजे से बहस शुरू करवा दी। यह न्याय नहीं है। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा – मैं न्यायाधीश नहीं हूँ। जो निर्णय करना है, लोकसभा करेगी। आप लोग करेंगे।

सब के सब अपनी जगह सही हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि कोई सांसद जिसे लोगों की समस्याओं से जुड़े प्रश्न पूछने और कुछ हद तक उनका निराकरण करवाने के लिए जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है, वे पैसे लेकर प्रश्न पूछने का किसी को ठेका कैसे दे सकते हैं? याद होगा कि वर्षों पहले एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में भी कुछ सांसद पकड़े गए थे जो पैसे लेकर प्रश्न पूछने के लिए तैयार हो गए थे। आख़िर यह परम्परा कैसे पड़ी? इस पर रोक के उपाय क्या हैं?

महुआ मोइत्रा को लोकसभा की सदस्यता से निष्कासित करना इस समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि प्रश्न पूछे जाने की प्रक्रिया को फूल प्रूफ़ बनाने से समस्या का समाधान होगा। इस दिशा में लोकसभा सचिवालय क्या कर रहा है, यह जनता को बताना चाहिए।

दूसरी तरफ, अगर महुआ मोइत्रा ही सही हैं और पूरा विपक्ष उनके सही होने से पूरी तरह सहमत हैं तो सामूहिक इस्तीफ़ा देकर इस पूरी प्रक्रिया का बहिष्कार क्यों नहीं कर दिया? कुल मिलाकर विरोध केवल विरोध करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अगर आप किसी बात से सहमत न हों।