सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: केजरीवाल की गिरफ्तारी पर अमेरिका के बयान के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी डिप्लोमैट को तलब किया। भारत में मौजूद अमेरिका के एक्टिंग डिप्टी चीफ ऑफ मिशन के साथ करीब 40 मिनट तक बैठक हुई। दरअसल, जर्मनी के बाद मंगलवार को अमेरिका ने भी अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के मुद्दे पर बयान दिया था।
इसके बाद विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के बयान का विरोध भी किया। उन्होंने कहा- भारत में कानूनी कार्रवाई पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान गलत है। कूटनीति में उम्मीद की जाती है कि देश एक दूसरे के आतंरिक मसलों और संप्रभुता का सम्मान करेंगे।
विदेश मंत्रालय ने आगे कहा- अगर 2 देश लोकतांत्रिक हों तो इसकी उम्मीद और बढ़ जाती है, नहीं तो अव्यवस्था की स्थिति बन सकती है। भारत में कानूनी प्रक्रिया एक स्वतंत्र न्यायपालिका पर आधारित हैं। उस पर कलंक लगाना या सवाल उठाना स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा था कि उनकी सरकार केजरीवाल मामले पर नजर बनाए हुए है।
अमेरिका ने कहा था- मामले में कानून के तहत कार्रवाई हो
दरअसल, अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा था- हमारी सरकार केजरीवाल की गिरफ्तारी के मामले पर नजर बनाए हुए है। हम उम्मीद करते हैं कि इस मामले में कानूनी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होगी। इस दौरान कानून और लोकतंत्र के मूल्यों का पालन किया जाएगा।
इससे पहले 23 मार्च को जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने भी केजरीवाल के मामले में बयान दिया था। उन्होंने कहा था- हमने इस मामले को नोटिस में लिया है। केजरीवाल को निष्पक्ष और सही ट्रायल मिलना चाहिए।
जर्मनी ने कहा था- केजरीवाल केस में लोकतंत्र के उसूलों का पालन हो
जर्मनी ने आगे कहा था- भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हमें उम्मीद है कि यहां न्यायालय आजाद है। केजरीवाल के मामले में भी लोकतंत्र के उसूलों का पालन किया जाएगा। केजरीवाल को बिना रुकावट कानूनी मदद मिलेगी। जब तक दोष साबित न हो तब तक किसी भी शख्स को निर्दोष मानने के कानूनी सिद्धांत का पालन होना चाहिए।
जर्मनी के बयान पर भारत ने उनकी एम्बेसी के डिप्टी हेड को तलब किया था। विदेश मंत्रालय ने कहा था- जर्मनी भारत के आतंरिक मामलों में दखलंदाजी न करे। हम इस तरह के बयानों को हमारी न्यायिक प्रक्रिया में दखल मानते हैं, इस तरह के बयान हमारे न्यायालय की निष्पक्षता और आजादी पर सवाल खड़े करते हैं।