आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : वर्ल्ड कप में भारतीय क्रिकेट टीम जिस तरह अपराजेय रहकर कमाल कर रही है, ये इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। पहले हमारी टीम ज़्यादातर बैटिंग के भरोसे जीतती थी। बॉलिंग ब्रिगेड कभी चलती थी, कभी पिट ज़ाया करती थी। इस बार दोनों ही मोर्चों पर द बेस्ट प्रदर्शन हो रहा है। निश्चित ही इस बार का वर्ल्ड कप अपना ही लग रहा है।

रविवार को दक्षिण अफ्रीका के सामने जब भारत ने 327 रन का टारगेट रखा तो ज़्यादातर क्रिकेट प्रेमियों को यह कम लग रहा था। कम इसलिए कि दक्षिण अफ्रीका ने कई मौक़ों पर चार सौ से अधिक रन भी चेज किए हैं। वो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 434 रन का चेज तो सबको याद ही है।

उसी को याद करके भारत द्वारा दिया गया टारगेट कम लग रहा था। लेकिन हमारे बॉलर्स ने कमाल कर दिया। सौ रन के भीतर ऑलआउट कर दिया। दक्षिण अफ्रीका को कभी मैच में आने ही नहीं दिया। एक के बाद एक उसके विकेट गिरते गए। जैसे पिछले दिनों श्रीलंका के गिरे थे। इससे साबित लगभग यह हुआ कि भारत के अलावा ज़्यादातर टीमें चेज करने में फिसड्डी हैं। वे शायद दबाव में आ जाती हैं और आयाराम गयाराम होने लगता है।

आयाराम गयाराम से याद आया कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आजकल यह शब्द बड़ा प्रचलित है। इसकी शुरुआत तो पहली बार चौधरी भजनलाल के कारण हरियाणा से हुई थी, लेकिन अब जहां भी चुनाव होते हैं, यह शब्द या मुहावरा बड़े ज़ोरों से साकार भी होता है और सुनाई भी देता है।

फ़िलहाल कांग्रेस जैसी पार्टी ने राजस्थान में कुछ बड़ों के टिकट काट दिए हैं। अक्सर देखा यह जाता है कि कांग्रेस अपने बड़े और पुराने नेताओं के टिकट नहीं काटती लेकिन इस बार महेश जोशी का टिकट काटा है।

समझा जाता है कि गहलोत के पक्ष में पार्टी आलाकमान तक की परवाह नहीं करने और उसे भी सार्वजनिक तौर पर भला- बुरा कहने की सजा इन दोनों नेताओं की दी गई है। यह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए भी बड़ा सेटबैक है। महेश जोशी उनके करीबी माने जाते हैं और उन्होंने तब जो कुछ किया था, गहलोत के पक्ष में ही किया था।

इसका मतलब है कि गहलोत के पक्ष में आलाकमान को खुली चुनौती जो दी थी, उसे राहुल ब्रिगेड ने बग़ावत ही समझा था और निश्चित तौर पर सचिन पायलट ने भी यह बात राहुल गांधी के सामने ज़ोर- शोर से परोसी होगी। ख़ैर आयाराम गयाराम मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी बहुतेरे हैं। दोनों तरफ़।

यह एक आश्चर्य की बात है क्योंकि पहले कांग्रेस में ही बग़ावती ज़्यादा हुआ करते थे। भाजपा में यह परंपरा बहुत कम थी। अब भाजपा में भी बगावतियों का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। बल्कि यह कहना सही होगा कि भाजपा के कार्यकर्ता अब कांग्रेस से भी ज़्यादा ग़ुस्सैल हो चुके हैं। दरअसल, भारतीय राजनीति की सचाई यह है कि जो भी पार्टी बड़ी होने लगती है, वो कांग्रेस हो जाती है।