आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने शुक्रवार (12 जनवरी) को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति वाले नए कानूनों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, पीठ ने एक्ट के प्रावधानों की वैधता की जांच करने पर सहमति जताई है।

सुप्रीम कोर्ट नए कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। ये याचिका कांग्रेस कार्यकर्ता जया ठाकुर ने दाखिल की थी। पीठ ने इन याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

नए कानून पर विपक्ष ने आपत्ति दर्ज कराई थी

दरअसल, नए कानून के मुताबिक आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यों का पैनल करेगा। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे। इस बिल को राज्यसभा में पेश किए जाने के समय विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई थी।

विपक्षी दलों का कहना था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश के खिलाफ बिल लाकर उसे कमजोर कर रही है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में एक आदेश में कहा था कि CEC की नियुक्ति प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और विपक्ष के नेता की सलाह पर राष्ट्रपति करें।

नया कानून सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन

जया ठाकुर की दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि धारा 7 और 8 स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन है क्योंकि यह चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र तंत्र (independent mechanism) प्रदान नहीं करता है।

याचिका में यह कहा भी गया है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के फैसले को पलटने के लिए बनाया गया, जिसने CEC और EC को एकतरफा नियुक्त करने की केंद्र सरकार की शक्तियां छीन ली थीं। यह वो प्रथा है जो देश की आजादी के बाद से चली आ रही है।

यह है CEC और EC की नियुक्ति का तरीका

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ के अध्यक्ष जस्टिस केएम जोसेफ ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर फैसला सुनाते हुए आदेश दिया था कि PM, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और CJI का पैनल इनकी नियुक्ति करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह प्रोसेस तब तक लागू रहेगा, जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोई कानून नहीं बना लेती। चयन प्रक्रिया CBI डायरेक्टर की तर्ज पर होनी चाहिए। केंद्र सरकार के पैनल में सीजेआई के नहीं होने पर विपक्ष का विरोध था। विपक्ष का कहना था कि यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को कम कर रही है।