आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : देश के सबसे प्रमुख मथुरा के बांके बिहारी मंदिर में शनिवार को पुजारियों के बीच विवाद हो गया। इसके चलते मंदिर का गेट ही नहीं खोला गया। करीब एक लाख भक्त 45 मिनट तक बाहर खड़े दर्शन का इंतजार करते रहे। ये भक्त देशभर से शरद पूर्णिमा के दिन भगवान की श्रृंगार भोग आरती में शामिल होने आए थे। हालांकि, एक पुजारी ने बंद दरवाजे में ही गर्भगृह में भगवान की आरती कर दी।
श्रृंगार भोग की आरती के बाद जब राजभोग आरती के पुजारी आए तो उन्होंने देखा कि भगवान गर्भगृह में ही विराजमान हैं। इसके बाद उन्होंने प्रबंधक को सूचना दी। 45 मिनट तक गेट न खुलने का पता चलते ही मंदिर प्रबंधन में हड़कंप मच गया। फिर भगवान को जगमोहन में लाकर विराजमान किया गया और मंदिर के पट खोले गए। मंदिर के प्रबंधक मुनीश शर्मा से भास्कर से कहा कि जिस सेवायत यानी पुजारी ने ऐसा किया है। उनसे बातचीत की जा रही है।
दरअसल, शरद पूर्णिमा के दिन परंपरा है कि पुजारी बांके बिहारी भगवान को गर्भगृह से बाहर जगमोहन में चांदी के सिंहासन पर विराजमान करते हैं। जगमोहन, मंदिर में एक स्थान है जो कि गर्भगृह के बाहर है। भीड़ के दिन यानी प्रमुख त्योहारों पर भगवान यहीं पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। क्योंकि, गर्भगृह में जगह बेहद कम है।
मथुरा मुंसिफ कोर्ट के आदेशों का नहीं हुआ पालन…जानते हैं पूरा विवाद
शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी जी को श्रृंगार भोग और राज भोग सेवा के लिए जगमोहन में विराजमान न करवाने की एप्लिकेशन दाखिल की गई। शयन भोग सेवा के अधिकारी रसिक बिहारी गोस्वामी की एप्लिकेशन शुक्रवार को मंदिर प्रशासक और मथुरा मुंसिफ कोर्ट ने खारिज कर दी। शरद पूर्णिमा के दिन देश-विदेश से आए भक्तों की सुविधा को देखते हुए कोर्ट ने आदेश दिया कि श्रृंगार भोग और राज भोग के समय भी भगवान को हर साल की तरह इस बार भी गर्भगृह से निकालकर जगमोहन में विराजमान करना होगा।
आदेश में कहा गया है कि जिस तरह 2018 से यह परंपरा शुरू हुई कि शरद पूर्णिया ने दिन सुबह के समय गर्भगृह से बाहर जगमोहन में बांके बिहारी को विराजमान किया जाता है और शयन भोग के बाद उन्हें गर्भगृह ले जाता है। उसी तरह इस बार भी जगमोहन में विराजमान किया जाए।
कोर्ट ने सुबह और दोपहर बांके बिहारी को जगमोहन में विराजमान करने का आदेश तो दिया। लेकिन, श्रृंगार भोग के पुजारी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने गर्भगृह में पूजा-पाठ किया। फिर चले गए। इसके बाद राज भोग के पुजारी आए। उन्होंने देखा कि भगवान गर्भगृह में ही हैं तो उन्हें जगमोहन में विराजमान कराया।
मंदिर प्रबंधक बोले- मामले पर पुजारी से बात की जा रही
बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा पर जगमोहन में भगवान को विराजमान कराकर दर्शन कराने को लेकर चल रहे विवाद पर मंदिर के प्रबंधक मुनीश शर्मा से भास्कर ने बात की। मुनीश शर्मा ने बताया कि पुजारी से बात की जा रही है।
मंदिर में आज शयन भोग के समय भी पट खुलने को लेकर संशय है। क्योंकि ग्रहण के कारण दोपहर 12 से 3 बजे तक शयन भोग के दर्शन होंगे। इस कारण शयन भोग की सेवा भी श्रृंगार भोग की सेवा करने वाले पुजारी ही करेंगे।
शरद पूर्णिमा पर ज्यादा समय दर्शन देते हैं बांके बिहारी, लेकिन इस बार ग्रहण
शरद पूर्णिमा पर मंदिर के समय में भी परिवर्तन किया जाता है। प्रशासक सिविल जज जूनियर डिवीजन का आदेश है कि शरद पूर्णिमा पर देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। उनकी सुविधा को देखते हुए सुबह-शाम दर्शन के लिए एक-एक घंटे का समय बढ़ा दिया जाए। हालांकि इस बार चंद्र ग्रहण है।
मंदिर प्रबंधक ने बताया कि आज चंद्र ग्रहण के कारण शरद पूर्णिमा पर मंदिर के समय में बदलाव किया गया है। सूतक लग जाने के कारण मंदिर के पट शनिवार को दोपहर 3.30 बजे शयन आरती कराकर बंद कर दिए जाएंगे। इसके बाद रविवार को सुबह मंदिर के पट खुलेंगे।
आगे बांके बिहारी की पूजा और पुजारी की ड्यूटी जानते हैं…
श्रृंगार भोग: सुबह के समय सबसे पहले बांके बिहारी जी का श्रृंगार भोग होता है। इस समय पुजारी भगवान का श्रृंगार करते हैं। आरती करते हैं। भोग लगाते हैं। ये सब करने में 15-20 मिनट लग जाते हैं। फिर पुजारी गर्भगृह से बाहर आ जाते हैं।
राज भोग: श्रृंगार भोग के बाद दोपहर में राजभोग का समय होता है। इसमें पुजारी दूसरे होते हैं। दोपहर में पुजारी आरती करते हैं। भोग लगाते हैं। फिर पट यानी मंदिर का गेट बंद हो जाता है और भगवान दोपहर में आराम करते हैं। ये सब करने में तीन से साढ़े तीन घंटे का समय लगता है।
शयन भोग: दोपहर के राज भोग के बाद शाम को शयन भोग का समय होता है। इसमें भी पुजारी दूसरे होते हैं। ये पुजारी आते हैं तो मंदिर का पट खोलते हैं। भगवान को भोग लगाते हैं। आरती करते हैं। फिर दर्शन-पूजा का सिलसिला बंद होता है। पुजारी भगवान का शयन कराते हैं… यानी भगवान के सोने का समय होता है। फिर पट यानी गेट बंद कर देते हैं। ये पुजारी 4-5 घंटे रहते हैं।
शरद पूर्णिमा पर किया था भगवान कृष्ण ने महारास
शरद पूर्णिमा पर मान्यता है कि इस दिन द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने धवल चांदनी में 16108 गोपियों की मनोकामना पूरी करते हुए उनके साथ महारास किया था। यमुना किनारे वृंदावन में वंशी वट पर किए गए इस महारास के दर्शन करने के लिए भगवान शिव स्वयं कैलाश से वृंदावन धाम पधारे थे। वंशी वट मंदिर के महंत गोविंद शर्मा ने बताया कि शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहां बंशी दान करने का महत्व है।
भगवान शिव बने गोपी
भगवान कृष्ण द्वारा किए गए महारास के दर्शन करने के लिए भगवान शिव भी कैलाश पर्वत से वृंदावन धाम आए। लेकिन, यमुना जी ने उनको रास में प्रवेश करने से रोक दिया। जब भगवान शिव ने अनुरोध किया तब यमुना जी ने उनका गोपी रूप में श्रृंगार किया। इसके बाद भगवान शिव ने गोपी रूप में रास में प्रवेश किया। रास के दौरान भगवान कृष्ण ने भोलेनाथ को पहचान लिया और कहा कि आए गोपेश्वर। तभी से बंशी वट के नजदीक गोपेश्वर नाथ का मंदिर है। जहां भगवान शिव भक्तों को गोपी रूप में दर्शन देते हैं।