कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और क्लाउड कंप्यूटिंग के तेज़ विस्तार के साथ दुनिया भर में बड़े-बड़े डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। ये डेटा सेंटर 24×7 सर्वर चलाते हैं, जिनसे भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए उन्नत कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है, जिनमें बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है। यही बढ़ती जल खपत अब जल संकट की एक नई चुनौती के रूप में सामने आ रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर प्रतिदिन लाखों लीटर पानी कूलिंग के लिए इस्तेमाल कर सकता है। कई कंपनियां शीतलन (कूलिंग) के लिए ‘इवैपोरेटिव कूलिंग’ तकनीक अपनाती हैं, जिसमें पानी का वाष्पीकरण कर तापमान नियंत्रित किया जाता है। सूखे या जल-संकट वाले क्षेत्रों में ऐसे संयंत्र स्थानीय जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं।

भारत जैसे देशों में, जहां पहले से ही कई शहर भूजल स्तर गिरने और अनियमित वर्षा की समस्या झेल रहे हैं, वहां एआई आधारित डेटा सेंटर का तेजी से विस्तार पर्यावरणीय संतुलन के लिए चिंता का विषय बन गया है। हालांकि कुछ तकनीकी कंपनियां जल पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग), वर्षा जल संचयन और वैकल्पिक कूलिंग तकनीकों पर काम कर रही हैं, फिर भी व्यापक स्तर पर टिकाऊ समाधान की आवश्यकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटर स्थापित करने से पहले जल उपलब्धता, स्थानीय पारिस्थितिकी और दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही, सरकार और उद्योग जगत को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो तकनीकी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन सुनिश्चित करें। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में एआई की प्रगति जल संकट को और गंभीर बना सकती है।

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