आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : उत्तर काशी की टनल में फँसे मज़दूरों का जीवन दो हफ़्तों से अधर में लटका हुआ है। हालाँकि राहत कार्य चल रहा है लेकिन सफलता मिलना अभी दूर है। तब तक फँसे हुए मज़दूर भगवान भरोसे हैं। किसी दल के बड़े- छोटे नेता को इस बारे में कोई चिंता नहीं है क्योंकि वे सब के सब चुनाव में लगे हैं। चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। वैसे कोई नेता चिंता करके या घटनास्थल पर जाकर भी परिस्थितियों को बदल तो नहीं सकता, लेकिन मॉनिटरिंग की जाए तो राहत कार्य में फुर्ती तो आ ही सकती है। लेकिन नेताओं को चुनाव से फुर्सत नहीं है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव हो चुके तो ये राजस्थान में लग गए। जब राजस्थान में चुनाव हो चुके तो सारे के सारे तेलंगाना जा धमके।
दरअसल, आम आदमी की मूल और असल समस्याओं से इन्हें कभी कोई लेना-देना नहीं होता। इन्हें तो सिर्फ़ चुनाव जीत कर या तो सत्ता में बने रहना होता है या सत्ता से किसी दूसरे को हटाकर खुद जम जाना है। पार्टी कोई भी हो, सरकारें सबकी एक जैसी ही होती हैं। वे नहीं बदलतीं। उनका स्वभाव नहीं बदलता। कभी नहीं। क्योंकि विपक्ष में रहकर सत्ताधारी दल या सरकार को पानी पी-पीकर कोसने वाले ही जब सत्ता में आते हैं तो वैसे ही हो जाते हैं जैसी पिछली सरकार होती है।
जिस चुनाव के लिए तमाम नेता माथापच्ची कर रहे हैं, उसकी बात करें तो राजस्थान और छत्तीसगढ़ के परिणाम का तो कुछ – कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता है, लेकिन मध्यप्रदेश बुरी तरह फँसा हुआ है। बड़े- बड़े तुर्रम भी मध्यप्रदेश के चुनाव पर मुँह नहीं खोल पा रहे हैं। काँटे की टक्कर कहकर सब के सब बचने में लगे हुए हैं। जहां तक राजस्थान का सवाल है, वहाँ सत्ता बदलने का रिवाज वर्षों से चला आ रहा है।
छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी दल का पलड़ा कुछ ही सही, लेकिन भारी लग रहा है। केवल मध्यप्रदेश कन्फ्यूजन में चल रहा है। यहाँ कुछ भी तय नहीं है। जो भी होगा, सीमा रेखा पर ही होगा। या तो ये दल उस पार होगा या फिर वो दल।
ख़ैर, हक़ीक़त तो 3 दिसंबर को ही पता चलेगी, जब पाँचों राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आएंगे। फ़िलहाल हर कोई अंदाज़ा लगाने में जुटा हुआ है। बहस करते- करते लोग लड़- झगड़ भी रहे हैं।