आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : 26 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को मेडिकली अबॉर्ट करने के केस में शुक्रवार 13 अक्टूबर को लगातार 5वें दिन सुनवाई हुई। दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने निर्देश दिया कि AIIMS के डॉक्टर्स का बोर्ड महिला की मानसिक और शारीरिक जांच करके उसकी मनोविकृत्ति का पता लगाए।

CJI ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता महिला को दोपहर 2 बजे बोर्ड के सामने पेश होना होगा। इसके बाद बोर्ड रिपोर्ट बनाए कि महिला को दी जा रही डिप्रेशन की दवाओं से भ्रूण को कैसे बचाया जा सकता है।

मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को सुबह 10.30 बजे होगी। इसी दिन AIIMS बोर्ड को यह रिपोर्ट CJI की बेंच में रखनी होगी।

एक दिन पहले पूछा था- क्या महिला कुछ दिन और इंतजार नहीं कर सकती

12 अक्टूबर को CJI की बेंच ने याचिकाकर्ता महिला के वकील से पूछा था कि 26 सप्ताह तक इंतजार करने के बाद, क्या वह कुछ दिन और इंतजार नहीं कर सकती। साथ ही ASG ऐश्वर्या भाटी और महिला की वकील को इस संबंध में उससे बात करने भी कहा था।

सुनवाई के दौरान CJI की बेंच ने क्या-क्या कहा…

संसद ने एक कानून बनाया है, जो प्रो लाइफ और प्रो चॉइस को बैलेंस करता है। इसे ध्यान में रखते हुए 24 वीक का कट ऑफ लगाया है। लेकिन हमारा कानून प्रो चॉइस है।

अगर आपको किसी महिला की जान बचानी है तो आप प्रेग्नेंसी खत्म कर सकते हैं। हमारा कानून में महिला के जीवन को सर्वोपरि रखा है। जैसा कि आयरलैंड में हुआ था जब एक महिला की मौत सिर्फ इसलिए हुई थी क्योंकि वह गर्भपात नहीं करा सकी और फिर आयरिश कानून में संशोधन किया गया।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी के लिए कानून में लिखा है- 20 वीक के लिए एक मेडिकल प्रैक्टिशनर, 20-24 वीक के लिए 2 डॉक्टर्स और फिर 24 वीक से ज्यादा के लिए एक बोर्ड फैसला लेगा। अगर महिला की जान खतरे में है तो आपको मेडिकल बोर्ड की जरूरत नहीं, क्योंकि जाहिर है ऐसा इमरजेंसी में किया जाएगा।

असामान्यता के साथ पैदा हुआ बच्चा माता-पिता के जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करेगा और दूसरा, इसका असर बच्चे के जीवन की गुणवत्ता पर पड़ेगा।

भले ही आप 28वें हफ्ते में भ्रूण की असामान्यता का पता लगा लें, हमारा कानून कहता है कि डॉक्टर जो कहें, उसके अनुसार चलें। जब आप मां की जान बचा रहे हैं, तो कोई कटौती नहीं है।

सिलसिलेवार पढ़िए इस केस में अब तक क्या-क्या हुआ

9 अक्टूबर : 26 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत दी, कहा- AIIMS जाएं जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने कहा कि अपने शरीर पर महिला का अधिकार है। अगर अनचाहे गर्भधारण से बच्चा पैदा होगा, तो उसे पालने की जिम्मेदारी महिला पर ही आएगी। इस वक्त वह इसके लिए तैयार नहीं है। उसे अबॉर्शन की इजाजत दी जाती है। कोर्ट ने महिला से कहा था कि वो 10 अक्टूबर को AIIMS जाए।

10 अक्टूबर: SC ने अबॉर्शन रोका, मां की अपील- मेरे 2 बच्चे, तीसरा नहीं चाहिए AIIMS के डॉक्टरों ने मंगलवार को कोर्ट में बताया कि भ्रूण के पैदा होने की संभावना है। इसके बाद कोर्ट ने डॉक्टरों को अबॉर्शन प्रोसेस रोकने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई के लिए बुधवार को एक नई बेंच का गठन किया जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर गर्भ में शिशु जीवित मिले तो डॉक्टरों की सलाह से उसे इन्क्यूबेशन में रख सकते हैं। 11 अक्टूबर: नई मेडिकल रिपोर्ट देखकर फैसला पलटा, 2 जज बंटे, केस बड़ी बेंच को भेजा कोर्ट ने नई मेडिकल रिपोर्ट पर नाराजगी जाहिर की। बेंच ने कहा कि रिपोर्ट में लिखा है कि 26 हफ्ते के भ्रूण के जीवित रहने की काफी संभावना है। जस्टिस हिमा कोहली प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने के पक्ष में नहीं थीं, लेकिन जस्टिस बीवी नागरत्ना उनसे सहमत नहीं थीं। दोनों जजों के बीच मतभेद के बाद मामले को बड़ी बेंच के पास रेफर कर दिया गया। 12 अक्टूबर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- महिला इतने दिन रुकी, क्या और इंतजार नहीं कर सकती चौथे दिन की सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा था- हमें अजन्मे बच्चे के अधिकार को मां के अधिकार के साथ बैलेंस करने की जरूरत है। वो एक जीवित भ्रूण है। क्या आप चाहते हैं कि हम AIIMS के डॉक्टरों को उसके दिल को रोकने के लिए कहें, हम ऐसा नहीं कर सकते। हम किसी बच्चे को नहीं मार सकते।