सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : बेल्जियम से लखीमपुर पहुंचा 200 टन का रिएक्टर, गन्ने से बनेगा बायोप्लास्टिक
लखीमपुर खीरी। बेल्जियम से भारत लाई गई करीब 200 टन वजनी विशाल औद्योगिक मशीन उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी स्थित प्लांट पहुंच गई है। इस मशीन को समुद्री मार्ग से ओडिशा के पारादीप बंदरगाह तक लाया गया और फिर विशेष मल्टी-एक्सल ट्रेलर की मदद से सड़क मार्ग से गंतव्य तक पहुंचाया गया। करीब छह महीने तक चले इस सफर में भारी वाहन को कई राज्यों और कठिन रास्तों से गुजरना पड़ा। विशाल ट्रेलर पर मशीन की आवाजाही लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रही।
आखिर क्या काम करेगी यह मशीन? इस मशीन को ‘साइक्लाइजेशन रिएक्टर’ कहा जाता है। यह कुंभी में स्थापित हो रहे बायोप्लास्टिक संयंत्र की प्रमुख मशीनरी में शामिल है। यहां गन्ने से प्राप्त चीनी का इस्तेमाल कर पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) बनाने की योजना है। इसके लिए चीनी से पहले किण्वन प्रक्रिया के जरिए लैक्टिक एसिड तैयार किया जाएगा। इसके बाद विभिन्न रासायनिक चरणों से गुजरते हुए पीएलए बनाया जाएगा। इस सामग्री से पैकेजिंग, कप, ट्रे और अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। 3,080 करोड़ रुपये की परियोजना
कुंभी में विकसित हो रहे इस संयंत्र की अनुमानित लागत करीब 3,080 करोड़ रुपये बताई गई है। परियोजना के शुरुआती चरण में प्रतिवर्ष लगभग 80 हजार टन पीएलए उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसे गन्ने से बायोप्लास्टिक तैयार करने वाली एकीकृत औद्योगिक परियोजना के रूप में विकसित किया जा रहा है। मशीन के पहुंचने के बाद इसकी स्थापना, परीक्षण और अन्य तकनीकी तैयारियां पूरी की जानी हैं। परियोजना प्रबंधन ने नवंबर 2026 में उत्पादन शुरू करने की उम्मीद जताई है। क्या इससे प्लास्टिक प्रदूषण घटेगा? पीएलए जैसे बायोप्लास्टिक कुछ उत्पादों में पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक का विकल्प बन सकते हैं। हालांकि, इनके पर्यावरणीय लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि उत्पाद का इस्तेमाल कैसे होता है और उसका निपटान किस तरह किया जाता है। पीएलए हर परिस्थिति में अपने आप तेजी से नष्ट नहीं होता; इसके विघटन के लिए विशेष परिस्थितियों की जरूरत पड़ सकती है। इस परियोजना से गन्ने पर आधारित उद्योगों को नया बाजार मिलने और स्थानीय स्तर पर औद्योगिक गतिविधियां बढ़ने की संभावना है। हालांकि, रोजगार, उत्पादन और पर्यावरणीय लाभ का वास्तविक आकलन संयंत्र के नियमित संचालन के बाद ही हो सकेगा।
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