सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद तथा एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बीच संभावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। मीडिया रिपोर्टों में दोनों दलों के बीच बातचीत आगे बढ़ने और सीटों के बंटवारे पर चर्चा होने का दावा किया गया है। हालांकि, गठबंधन की औपचारिक घोषणा और सीटों के अंतिम समझौते की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। दलित-मुस्लिम समीकरण पर नजर उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विभिन्न अनुमानों में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी लगभग 19 प्रतिशत बताई जाती है। दोनों समुदायों की संयुक्त आबादी करीब 40 प्रतिशत होने का अनुमान है, लेकिन इसे किसी गठबंधन का सुनिश्चित वोट आधार नहीं माना जा सकता।
चंद्रशेखर आजाद दलित समुदाय, विशेषकर युवाओं के बीच अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, ओवैसी की पार्टी मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अपने संगठन के विस्तार पर जोर देती रही है। दोनों दल साथ आते हैं तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड और कुछ अन्य क्षेत्रों में साझा उम्मीदवारों के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं। सीटों के बंटवारे पर हो सकती है बातचीत मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश की कुछ मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। रिपोर्टों में 40 से 45 सीटों पर उसके दावे की चर्चा भी है। हालांकि, इसे अंतिम सीट-बंटवारा नहीं माना जा सकता। दोनों दलों के बीच किन सीटों पर सहमति बनी है, इसकी आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है।
एआईएमआईएम के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने पहले गठबंधन संबंधी सवालों पर कहा था कि अंतिम फैसला पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी करेंगे। उन्होंने औपचारिक आमंत्रण मिलने की पुष्टि भी नहीं की थी। ऐसे में गठबंधन की स्थिति स्पष्ट होने के लिए दोनों दलों के आधिकारिक बयान महत्वपूर्ण होंगे। मायावती और अखिलेश की राजनीति पर क्या असर? चंद्रशेखर आजाद का दलित राजनीति में विस्तार बहुजन समाज पार्टी की पारंपरिक भूमिका के संदर्भ में चर्चा का विषय है। दूसरी ओर, ओवैसी की सक्रियता समाजवादी पार्टी के मुस्लिम समर्थन आधार पर संभावित प्रभाव को लेकर राजनीतिक बहस पैदा कर सकती है। हालांकि, मतदाताओं का रुख स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दों, पार्टी संगठन और चुनावी परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा। यदि दोनों दल गठबंधन की घोषणा करते हैं, तो सीटों का चयन, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और साझा प्रचार की रणनीति उनकी राजनीतिक भूमिका तय करने में अहम होंगे। फिलहाल, 2027 के चुनाव से पहले संभावित नए मोर्चे की चर्चा के बीच औपचारिक घोषणा और सीटों के बंटवारे पर सबकी नजर है।
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