
भोपाल के रहने वाले राजेंद्र जांगले इन दिनों चर्चा में हैं। हाल ही में उन्हें डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मांदल के बोल’ के लिए 68वें नेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट एथनोग्राफिक फिल्म का अवार्ड मिला है। राजेंद्र ने इस फिल्म का डायरेक्शन किया है। वह 6 नेशनल अवार्ड अपने नाम कर चुके हैं। जांगले को ट्राइब्स से खासा लगाव रहा है। उनकी अधिकांश डॉक्यूमेंट्री आदिवासियों पर आधारित रही है। उनकी फिल्मी यात्रा और ट्राइबल्स से लगाव के बारे में जानते हैं।
राजेंद्र जांगले की फिल्म ‘मांदल के बोल’ को नॉन-फीचर फिल्म कैटेगरी में बेस्ट एथनोग्राफिक फिल्म का अवार्ड मिला। इस फिल्म को भोपाल स्थित ट्राइबल म्यूजियम के लिए बनाया गया था। इसकी शूटिंग 2019-20 में की गई थी। बैगा जनजाति के लोगों में आए बदलाव के बारे में बताते हुए जांगले कहते हैं कि 30 साल पहले और अब में काफी अंतर आया है। अब नौजवान मोबाइल फोन चलाते हैं। घरों पर डिश एंटीना लगा दिख जाता है। बाजारों में भी जहां पहले रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा सामान ही मिलता था, वहां अब स्पीकर, सीडी प्लेयर आदि भी उपलब्ध हैं। पहले शादी समारोह में ढोल और मांदल बजाए जाते थे, मगर अब डीजे बजता है। हालांकि बुजुर्ग अपनी परम्पराओं को आज भी सहेजे हुए हैं।
ट्राइब्स से है खासा लगाव
राजेंद्र जांगले को 2 नेशनल अवॉर्ड मध्य प्रदेश की जनजाति पर फिल्म बनाने के लिए मिले हैं। वे कहते हैं कि उनके दिल में जनजाति समुदाय के लिए खास जगह है। उनके साथ समय बिताना, बातें करना अच्छा लगता है। जांगले कहते हैं कि जब वह बैगा फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, तो बैगा लोगों से जुड़ी सभी परम्पराओं को कैमरे में कैद कर चुके थे। मगर, शादी के दृश्य नहीं मिल पा रहे थे।
बात करने पर पता चला कि शादी तय तो हो चुकी है, मगर पैसे की कमी के कारण नहीं पा रही है। तब राजेंद्र जांगले और पूछा कि शादी के लिए क्या चाहिए? बताया गया कि चावल की कुछ बोरियां, ड्रम भरकर महुआ और करीब 3-4 हजार रुपए लगेंगे। जांगले और उनकी टीम द्वारा इसकी व्यवस्था की गई, फिर जो शादी बाद में होनी थी, वो उसी समय करवाई गई। तब जाकर जांगले फिल्म के लिए बैगा जनजाति की शादी को शूट कर सके।