आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : रूस-यूक्रेन जंग को 500 दिन पूरे हो चुके हैं। इस बीच शनिवार को तुर्किये ने यूक्रेन के NATO में शामिल होने का समर्थन किया। इस्तांबुल में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात के बाद एक जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन ने कहा- इस बात में कोई शक नहीं है कि यूक्रेन को NATO में शामिल होने का हक है। इसके साथ ही एर्दोगन ने जंग खत्म करने के प्रयासों पर भी जोर दिया।
रॉयटर्स के मुताबिक, एर्दोगन ने कहा- अगर निष्पक्ष तौर से जंग खत्म कर शांति स्थापित की जाएगी तो इसमें किसी का नुकसान नहीं है। वहीं जेलेंस्की ने एर्दोगन को तुर्किये के सपोर्ट के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा- मैं यूक्रेन की अखंडता और शांति के लिए समर्थन देने के लिए तुर्किये का आभारी रहूंगा।
चेक रिपब्लिक बोला- जंग खत्म होते ही NATO में शामिल हो यूक्रेन
बता दें कि 11-12 जुलाई को लिथुआनिया के विल्नियस शहर में NATO समिट होने वाली है, जिससे पहले जेलेंस्की मेंबरशिप के लिए दूसरे सदस्यीय देशों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले जेलेंस्की ने चेक रिपब्लिक, बुल्गारिया और स्लोवाकिया की भी यात्रा की थी।
चेक रिपब्लिक ने जंग खत्म होते ही यूक्रेन के NATO में शामिल होने की पैरवी की थी। NATO के सेक्रेटरी जनरल जेन्स स्टॉलटेनबर्ग ने भी कहा था कि यूक्रेन NATO में जरूर शामिल होगा। हालांकि, उन्होंने इसके लिए कोई टाइमलाइन या तारीख की घोषणा नहीं की थी।
अमेरिका बोला- यूक्रेन को NATO मेंबरशिप से पहले कई कदम उठाना जरूरी
वहीं अमेरिका ने आने वाले समय में यूक्रेन के NATO में न शामिल होने की आशंका जताई है। अमेरिका के NSA जेक सुलीवन ने कहा- विल्नियस में होने वाली समिट NATO में नए मेंबर्स के शामिल होने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि, यूक्रेन को अब भी NATO में शामिल होने से पहले कई जरूरी कदम उठाने हैं। वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन की मेंबरशिप को लेकर कई बार चेतावनी दे चुके हैं।
NATO की नींव कैसे पड़ी थी
दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ को रोकने के लिए अमेरिकी और यूरोपीय देशों ने सैन्य गठबंधन बनाया था, जिसे NATO के नाम से जाना जाता है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ और अमेरिका दो सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे, जो दुनिया पर अपना दबदबा कायम करना चाहते थे। इससे अमेरिका और सोवियत संघ के संबंध बिगड़ने लगे और उनके बीच कोल्ड वॉर की शुरुआत हुई।
सोवियत संघ की कम्युनिस्ट सरकार दूसरे विश्व युद्ध के बाद कमजोर पड़ चुके यूरोपीय देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती थी।
सोवियत संघ की योजना तुर्की और ग्रीस पर दबदबा बनाने की थी। तुर्की और ग्रीस पर पर कंट्रोल से सोवियत संघ ब्लैक सी के जरिए होने वाले दुनिया के व्यापार को कंट्रोल करना चाहता था।
सोवियत संघ की इन नीतियों से पश्चिमी देशों और अमेरिका से उसके संबंध पूरी तरह खराब हो गए।
आखिरकार यूरोप में सोवियत संघ के दबदबे को रोकने के लिए यूरोपीय देशों और अमेरिका ने मिलकर NATO की नींव डाली।