आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने सोमवार को तुर्किये के प्रेसिडेंट रिसेप तैयप एर्दोगन से मुलाकात की। एर्दोगन ने पुतिन को ग्लोबल फूड क्राइसिस से निपटने में मदद मांगी और कहा कि रूस को पुरानी ग्रेन डील फिर शुरू करनी चाहिए। पुतिन ने इससे साफ इनकार कर दिया।

न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक- रूसी राष्ट्रपति ने एर्दोगन से कहा कि वो सिर्फ उसी सूरत में ग्रेन डील शुरू कर सकते हैं, जब पश्चिमी देश उनकी शर्तें मान लें। एर्दोगन ने पिछले साल पुतिन को ग्रेन डील के लिए मनाया था। तब रूस ने वादा किया था कि वो यूक्रेन के ब्लैक सी यानी काले सागर से गुजरने वाले कार्गो शिप्स को निशाना नहीं बनाएंगे।

अफ्रीका के 6 देशों को अनाज देगा रूस

एर्दोगन से मुलाकात के बाद पुतिन ने एक बयान जारी किया। कहा- हमने वादा किया था कि मिडिल ईस्ट और अफ्रीका को रूस फूड प्रोडक्ट्स सप्लाई करेगा और हम इस वादे पर कायम हैं। रूस और यूक्रेन गेहूं और सनफ्लॉवर ऑयल के सबसे बड़े सप्लायर हैं। खासतौर पर ईस्ट अफ्रीका के गरीब देशों को जो अनाज और तेल जाता है, वो ज्यादातर इन्हीं देशों का होता है।

जुलाई में यह डील खत्म हो गई थी और रूस ने साफ कर दिया था कि रूस अब इस डील को एकतरफा तौर पर खत्म कर रहा है। रूस के मुताबिक- पश्चिमी देशों ने जो पाबंदियां लगाई हैं, उसकी वजह से रूस के एग्रीकल्चर सेक्टर पर गंभीर असर पड़ा है और इन पाबंदियों को खत्म करना होगा। अफ्रीकी देशों को ग्रेन सप्लाई का जो भरोसा दिलाया गया है, वो हर हाल में पूरा किया जाएगा।

पिछली बार भी एर्दोगन ने इस डील में अहम भूमिका निभाई थी। इस बार भी वो ही पुतिन को डील शुरू कराने के लिए तैयार करना चाहते थे, लेकिन सोमवार की मीटिंग के बाद यह साफ हो गया है कि पुतिन झुकने को तैयार नहीं हैं।

रूस के इस फैसले का हर तरफ विरोध हो रहा है। UN ने कहा है कि इससे लाखों लोगों के भूख से मरने का खतरा बढ़ जाएगा। अमेरिका ने इसे तानाशाही रवैया करार दिया है, तो यूक्रेन के राष्ट्रपति वोल्दोमिर जेलेंस्की ने कहा है कि वो दुनिया को अनाज सप्लाई करते रहेंगे।

रूस के फैसले पर एक नजर

24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया और दोनों देशों के बीच जंग शुरू हो गई। यूक्रेन फूड सप्लाई के मामले में दुनिया के अव्वल देशों में से एक है। ब्लैक सी से गुजरने वाले उसके ग्रेन शिप्स पर रूस के हमलों का खतरा था। लिहाजा, उसने सप्लाई रोक दी और इससे चेन एंड सप्लाई कमजोर पड़ गई। कई यूरोपीय देशों के अलावा अफ्रीका में लोगों के भूख से मरने का खतरा पैदा हो गया।