आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : अफगानिस्तान में जो लोग कभी देश के लिए सैनिक थे, तालिबान के कब्जे के बाद अब वे पेट पालने के लिए खदानों में काम कर रहे हैं। उन्हें न तो खदानों में काम करने का अनुभव है, न सुरक्षा उपकरण खरीदने के लिए पैसा, लेकिन खुद के और परिवार के लिए रोटी के बदले अंधेरी गुफा सरीखी खदानों में गैंती-फावड़े लेकर जूझ रहे हैं।

नूरिस्तान प्रांत में तालिबान के कब्जे के बाद अपनी नौकरी खोने वाले अब्दुल कादर आबिद (30) भी ऐसे ही पूर्व सैनिकों में शामिल हैं। वह अपने अनेक पूर्व सैनिक साथियों के साथ नूरिस्तान की राजधानी पारुन से कुछ किलोमीटर दूर पेड़ों से घिरी घाटी में बतौर खदान कारीगर काम कर रहे हैं।

पारुन की घाटी में हैं बेशकीमती पत्थर

यहां सुरंग के प्रवेश द्वार के एक तरफ आबिद को आश्रय दिया गया है। यहां अंधेरे में विस्फोट के बीच छर्रे उछलते हैं। धूल-धुआं उड़ता है। लेकिन धुआं छंटते ही आबिद मलबे में चमकीले पत्थर में रत्न ढूंढ़ने लपकते हैं।

आबिद कहते हैं, ये चमकीले पत्थर- माणिक, नीलम, टूमलाइन, लापीस लाजुली और पुखराज हैं। ये बेशकीमती हैं, जिनकी दुनिया में बहुत मांग है। हमें ज्यादा कुछ नहीं मिलता, सुरक्षा उपकरण नहीं होने से हादसों का खतरा भी रहता है, लेकिन कम से कम तालिबान से तो सुरक्षित हैं। तालिबान के कब्जे के बाद हमारी नौकरी रातोंरात चली गई थी।

फिर 2022 की शुरुआत में मैंने और मेरे साथियों ने खदान के लिए जमीन का एक टुकड़ा पट्टे पर लिया था। छह महीने से यहां काम कर रहे हैं। हम टैक्स भी देते हैं। पहले देश के लिए काम करते थे, अब दुनिया के लिए माणिक-हीरा निकालते हैं।

अफगानिस्तान से कुल निर्यात का 45% हिस्सा रत्नों का

दसवीं शताब्दी तक उत्तरी, पूर्वी अफगानिस्तान की रत्न खदानें अपने रत्नों के लिए काफी प्रसिद्ध थीं। द ऑब्जर्वेटरी ऑफ इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी के अनुसार 2019 में वहां के निर्यात में 45 प्रतिशत हिस्सा रत्न से संबंधित था।