आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल :  अमेरिका में आठवीं तक के स्कूली बच्चे अरबों डॉलर की राशि खर्च होने के बावजूद अपेक्षित शैक्षणिक फायदे हासिल नहीं कर पाए। मैथेमेटिक्स और रीडिंग में उनका प्रदर्शन और खराब हुआ है। कुछ मामलों में तो वे महामारी के बाद और भी पीछे जा रहे हैं। जबकि माना ये जा रहा था कि बच्चे तेज गति से सीख रहे होंगे। ये दावा गैर लाभकारी संस्था नॉर्थवेस्ट इवैल्यूएशन एसोसिएशन (NWEA) की देशव्यापी स्टडी में किया गया है।

एक्सपर्ट कहते हैं- यह स्थिति तब है जब शिक्षा में सुधार व मानसिक सेहत संबंधी चिंताओं के समाधान के लिए स्कूलों को 10 लाख करोड़ रुपए का फंड दिया गया था पर नतीजे निराशा ही लाए। स्टडी के दौरान सरकारी स्कूलों के 67 लाख बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इसके मुताबिक तीसरी ग्रेड के छात्रों को नुकसान कम हुआ, क्योंकि महामारी की दस्तक के वक्त वे केजी में थे। बाकी छात्र तो प्री-कोविड से भी कमजोर हुए।

रिसर्चर कैरन लुईस कहते हैं- भले ही आपात स्थिति नहीं है, पर बच्चे अब तक नतीजे भुगत रहे हैं। यानी रिकवरी जल्द और आसान नहीं है।

नियमित क्लास के अलावा पढ़ाई करनी होगी

लुईस कहते हैं- एक छात्र को मैथ में प्री-कोविड स्तर पर पहुंचने के लिए औसत साढ़े चार माह की अतिरिक्त पढ़ाई और रीडिंग के लिए औसत 4 माह ज्यादा देना होंगे। यह नियमित क्लास के अलावा है। आमतौर पर बड़े छात्रों की सीखने की स्पीड धीमी होती है, इसलिए उन्हें ज्यादा संघर्ष करना होगा। हार्वर्ड के अर्थशास्त्री टॉम केन कहते हैं- छात्रों के लिए बदलाव लाने वाले प्रोग्राम तो शुरू किए गए पर इनमें कोई भी जरूरी या प्रभावी नहीं था।

यानी रिकवरी को शुरू से ही कम महत्व दिया गया। अब चुनौती यह है कि 4 माह के इस अंतराल को कैसे खत्म करें। स्टडी में सुझाव दिया गया है कि सालभर तक हफ्ते में तीन बार हाईडोज्ड ट्यूशन (एक ट्यूटर को 4 छात्रों से जोड़ना) 4 माह की पढ़ाई के बराबर फायदा दे सकता है पर यह महंगा है। ताजा सर्वे बताता है कि 37% पब्लिक स्कूलों ने ही इस सिस्टम के लिए सकारात्मक रुख दिखाया, क्योंकि बड़ी संख्या में स्कूल अपने हिस्से का फंड खर्च कर चुके हैं।

जो छात्र पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं, वे जिंदगी में 58 लाख तक कम कमाते हैं: स्टडी

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी में बताया गया है कि जो छात्र पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं, उनके कॉलेज तक पढ़ाई करने की संभावना कम हो सकती है। उनकी जिंदगी की कुल कमाई महामारी पूर्व के छात्रों की तुलना में 58 लाख रुपए तक कम हो सकती है। उच्च शिक्षा के स्तर पर यह खाई और बढ़ सकती है।

औसत कमाई घटने से भविष्य में जीडीपी को भी नुकसान हो सकता है। अर्थशास्त्री टॉम केन के मुताबिक यदि पढ़ाई प्री-कोविड स्तर पर लौट आई तो भी छात्रों का एक बड़ा वर्ग कम कुशलता के साथ वर्कफोर्स में आएगा। ये कमी मंदी का कारण बनेगी। इसलिए तत्काल बदलाव करने जरूरी हैं।