सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : यूपी में वाल्मीकि समाज का सियासी प्रभाव, एक दर्जन सीटों पर अहम भूमिका
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की नजर विभिन्न सामाजिक वर्गों के समर्थन पर है। इसी क्रम में वाल्मीकि समाज भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। अनुसूचित जाति समुदाय का हिस्सा होने के कारण इस समाज की भूमिका खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मानी जाती है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस सहित विभिन्न दल इस समुदाय के बीच अपना जनाधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रदेश में कितनी है वाल्मीकि समाज की आबादी? 2011 की जनगणना के जातिवार आंकड़ों के आधार पर उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में वाल्मीकि समाज की आबादी करीब 13.2 लाख है। यह राज्य की कुल आबादी का एक प्रतिशत से कम और अनुसूचित जाति की आबादी का लगभग पांच प्रतिशत है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस समुदाय की पहचान वाल्मीकि, बाल्मीकि, भंगी, मेहतर और लालबेगी जैसे नामों से भी होती है। आबादी के आंकड़ों को समझते समय इन क्षेत्रीय पहचानों और सरकारी वर्गीकरण को ध्यान में रखना जरूरी है।
पश्चिमी यूपी के किन इलाकों में प्रभाव? वाल्मीकि समाज की उल्लेखनीय मौजूदगी मेरठ, गाजियाबाद, आगरा, अलीगढ़, हाथरस, बुलंदशहर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में है। शहरी क्षेत्रों और नगर निकायों में समुदाय की भागीदारी इसे स्थानीय चुनावों में भी महत्वपूर्ण बनाती है। कुछ राजनीतिक आकलनों के अनुसार, प्रदेश की करीब एक दर्जन विधानसभा सीटों पर इस समाज के मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, किसी सीट पर निर्णायक प्रभाव का आकलन केवल आबादी के आधार पर नहीं किया जा सकता; दूसरे समुदायों के समर्थन और उम्मीदवारों की स्थिति भी अहम होती है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कौन-कौन से चेहरे? उत्तर प्रदेश की राजनीति में वाल्मीकि समाज से जुड़े कई नेता सक्रिय हैं। भाजपा के सुरेंद्र दिलेर और अनूप प्रधान वाल्मीकि प्रमुख नामों में शामिल हैं। सुरेंद्र दिलेर अलीगढ़ की खैर विधानसभा सीट से विधायक हैं और मई 2026 में राज्य सरकार में मंत्री बनाए गए। वहीं, अनूप प्रधान वाल्मीकि हाथरस लोकसभा सीट से सांसद हैं। समाजवादी पार्टी में प्रभु दयाल वाल्मीकि और जसवीर वाल्मीकि जैसे नेता भी राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं।
भाजपा, सपा और बसपा की रणनीति पिछले चुनावों में भाजपा ने वाल्मीकि समाज के बीच संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के जरिए अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश की है। दूसरी ओर, सपा अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ के जरिए विभिन्न सामाजिक वर्गों को साथ लाने पर जोर दे रही है। बसपा भी दलित राजनीति में अपने पारंपरिक आधार को मजबूत करने की कोशिश करती रही है। हालांकि, किसी समुदाय को किसी एक पार्टी का स्थायी मतदाता मानना सही नहीं होगा। मतदान का रुख स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों, विकास, रोजगार और राजनीतिक दलों के प्रति लोगों के अनुभवों से भी प्रभावित होता है।
2027 के चुनाव में कितनी अहम होगी भूमिका? आगामी विधानसभा चुनाव में वाल्मीकि समाज की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व का सवाल महत्वपूर्ण रह सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर समुदाय की स्थानीय मौजूदगी उम्मीदवारों और दलों के लिए अहम हो सकती है। इसके बावजूद अभी यह कहना संभव नहीं है कि समाज का समर्थन किस राजनीतिक दल को मिलेगा। चुनाव के दौरान सामने आने वाले मुद्दे, उम्मीदवारों का चयन और स्थानीय परिस्थितियां ही वास्तविक राजनीतिक समीकरणों को स्पष्ट करेंगी।
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