खरसिया : बाराद्वार (जांजगीर-चांपा) की विभत्स घटना मानवता को कलंकित करने वाली है। मृत्यु के बाद शव का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार ना केवल धार्मिक और कानूनी बल्कि मानवीय अधिकार भी है।
गौरतलब है कि बस्ती बाराद्वार में कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा श्मसान घाट से जलती चिता को पानी डालकर बुझा दिया गया एवं शव को लात मारकर चिता से हटा दिया गया।
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज संगठन खरसिया के संरक्षक राकेश नारायण बंजारे ने इस घटना को घृणित, निंदनीय एवं सभ्य समाज के लिए कलंक बताया। उन्होंने इस घटना की भर्त्सना करते हुए कहा कि जब देश, प्रदेश, समाज, विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए इक्कीसवीं सदी में गतिमान हैं तो कुछ लोगों की सोच अभी भी कबिलाई संस्कृति में ही उलझा हुआ है। देश और समाज आपके द्वारा चलाए गए कबिलाई कानून के अनुसार नहीं बल्कि भारतीय संविधान में लिखे कानून के अनुसार चलता है जिसमें जाति-पाति भेदभाव और ऊंच-नीच के लिए कोई स्थान नहीं है। जाति के आधार पर लाश को दाह संस्कार की प्रक्रिया से रोकना कुंठित मानसिकता का परिचायक है। ऐसे समाज विरोधियों एवं सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने वालों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।