आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : दुनिया भर में क्लाइमेट चेंज की वजह से सदी के अंत तक ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ सकता है। इससे भारत-पाकिस्तान समेत ज्यादा आबादी वाले देशों में ज्यादा गर्मी पड़ेगी। इसकी वजह से लोगों को हीट स्ट्रोक और हार्ट अटैक जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

यह रिसर्च पेन स्टेट कॉलेज ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन डेवलपमेंट, पर्ड्यू यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंसेज और पर्ड्यू इंस्टीट्यूट फॉर ए सस्टेनेबल फ्यूचर ने मिलकर किया है। इस रिपोर्ट को प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के रिसर्च पेपर में पब्लिश किया गया है।

विकसित देश, विकासशील देशों की तुलना में कम प्रभावित

रिसर्च में बताया गया कि अगर दुनियाभर का तापमान प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो इससे कई देशों में हीटवेव बढ़ेगी। इसमें भारत, पाकिस्तान, पूर्वी चीन और सब-सहारा अफ्रीका का हिस्सा शामिल है।

साथ ही रिपोर्ट में बताया गया कि अगर धरती का तापमान प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से 3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ता है तो इसका असर अमेरिका में भी होगा। रिसर्च में पाया गया कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देश ज्यादा प्रभावित होंगे।

प्री-इंडस्ट्रियल लेवल के मुकाबले तापमान में इजाफे को 2 डिग्री कम रखने का टारगेट

क्लाइमेट चेंज पर बने इंटरगवर्नमेंटल पैनल (IPCC) के मुताबिक, प्री-इंडस्ट्रियल काल 1850 से 1900 के बीच के समय को कहा जाता है। इस समय के मुकाबले अब के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है।

2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौता में कहा गया है कि इस सदी में तापमान में इजाफे को प्री-इंडस्ट्रियल तापमान से 2 डिग्री कम रखना है। बल्कि ये कोशिश करनी चाहिए कि ये इजाफा 1.5 डिग्री तक सीमित रखा जा सके।

कम इनकम वाले देशों को सबसे ज्यादा नुकसान: प्रो ह्यूबर

पर्ड्यू यूनिवर्सिटी में अर्थ, एटमॉस्फियर और प्लेनेटरी साइंस के प्रोफेसर मैथ्यू ह्यूबर ने कहा कि गर्मी की वजह से सबसे ज्यादा परेशानी उन देशों को होगी, जो समृद्ध नहीं हैं। इसके अलावा उन देशों में भी दिक्कतें आएंगीं, जहां आने वाले दशकों में तेजी से जनसंख्या बढ़ने की उम्मीद है।

प्रोफेसर ह्यूबर ने कहा कि ये देश अमीर देशों की तुलना में बहुत कम ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करते हैं। इसके बावजूद इन्हें गर्मी की मार झेलनी पड़ सकती है। इससे करोड़ों गरीब लोग प्रभावित होंगे और लाखों लोग मर सकते हैं।

प्रो ह्यूबर ने बताया कि तापमान को बढ़ने से रोकने के लिए ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन जलाने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस को कम करना होगा। अगर बदलाव नहीं किए गए तो लोअर और मिडिल इनकम वाले देशों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा।

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एशिया, साउथ अमेरिका, नॉर्थ अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका के कई देशों जैसे- भारत, जापान, रूस में टाइनी, मिनी या पॉकेट फॉरेस्ट (छोटे शहरी जंगल) कवर साल-दर-साल बढ़ रहा है। ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में सिकुड़ते जंगलों की खबरों के बीच आपको ये बात राहत भरी लग सकती है। लोग पार्किंग एरिया, स्कूल के ग्राउंड्स और कबाड़खानों को छोटे जंगलों में तब्दील कर रहे हैं।

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