सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: राजनीति में महिलाओं की ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी के लिए अब व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। केवल महिला आयोग ही नहीं, केंद्र सरकार भी गंभीर है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम से विधेयक पारित हो चुका है। इसके अनुसार 2029 से संसद और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

इतिहास देखें तो आज़ादी से पहले भी महिला वर्ग काफी सक्रिय रहा। आज़ादी की लड़ाई के हर मोर्चे, चाहे वो गांधीजी का नरमपंथी आंदोलन हो, क्रांतिकारियों की उग्र लड़ाई हो या नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज हो, महिलाएँ हर तरफ़ सक्रिय रहीं। उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को आज़ादी के संघर्ष के इतिहास का कोई पन्ना भुला नहीं सकता।

1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध शुरू हुए आंदोलन से लेकर 1942 के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन तक हर दौर में महिलाएँ आगे रहीं। पुरुषों की बराबरी के लिए महिलाओं ने आंदोलन तभी छेड़ दिया था जब वे आज़ादी की लड़ाई लड़ रही थीं और संविधान ने यह गारंटी दी थी कि प्रतिनिधि सभाओं में महिलाओं की कम भागीदारी के बावजूद भारतीय महिलाओं के स्तर और अधिकारों की उन्नति में कोई भी क़ानून कभी भी प्रतिबंधात्मक नहीं होगा।

संविधान सभा ने जब नवंबर 1949 में संविधान को अंतिम रूप दे दिया तब की कुल 313 सदस्य संख्या में महिला सदस्यों की संख्या मात्र 11 थी; लेकिन संविधान सभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम होने की वजह से महिलाओं को समान अधिकार देने के संविधान सभा के उद्देश्य में कोई विचलन नहीं आया। यही वजह है कि अनुच्छेद- 15 के तहत धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिबंध है।

आज हालाँकि महिलाओं के लिए आरक्षण को लेकर राजनीतिक पार्टियां उत्साहित हैं। होना भी चाहिए। इससे राजनीति के अपराधीकरण पर काफ़ी हद तक अंकुश लगेगा। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के दौर में महिलाएँ उनके लिए संसदीय अथवा विधानसभा सीटों के आरक्षण के एकदम ख़िलाफ़ थीं। तब वे मानती थीं कि आरक्षण कमजोरी तथा पिछड़ेपन की निशानी है, इसलिए वे इसे स्वीकार नहीं करेंगी। वे चाहती थीं कि महिलाएँ खुद को पुरुषों की बराबरी का प्रतियोगी साबित करें और उन्हें यह भरोसा था कि वे यह कर दिखाएँगी।