आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : चुनावों में टिकटों का बाज़ार गर्म है। छत्तीसगढ़ लगभग इस मान से पूरा हो चुका है। मध्यप्रदेश भी लगभग इसी क़तार में चल रहा है, लेकिन राजस्थान में अब तक सूखा पड़ा हुआ है। शायद इसलिए कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की बजाय राजस्थान के चुनाव बाद में हैं।
छत्तीसगढ़ में तो पहला चरण 7 नवम्बर को ही है। दूसरा चरण मध्यप्रदेश के साथ 17 नवम्बर को। हालाँकि छठ के कारण 17 नवम्बर को मतदान की तारीख़ आगे बढ़ाने की माँग की जा रही है लेकिन लगता है इस दिशा में चुनाव आयोग कोई विचार नहीं कर रहा है। राजस्थान में मतदान की तारीख़ 23 नवम्बर से बढ़ाकर 25 नवम्बर कर दी गई है।
उधर राजस्थान में सूची भले ही जारी नहीं हो सकी हो, लेकिन कांग्रेस में ज़्यादातर नाम क्लियर होने की सूचनाओं ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और युवा नेता सचिन पायलट को बहुत हद तक एक कर दिया है। शुक्रवार को हुई सभाओं और रैलियों में गहलोत और पायलट के सुर काफ़ी मिले- जुले सुनाई दिए।
हो सकता है पार्टी आलाकमान ने समझाया होगा कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा ये सब कुछ बाद में देख लिया जाएगा, पहले मिलकर चुनाव लड़ने और जीतने की ज़रूरत है। ये हो गया तो सब कुछ हो जाएगा। पिछले दो साल से जो बात दोनों नेता समझने को तैयार नहीं थे, शायद अब समझ गए होंगे। बयानों से तो ऐसा ही प्रतीत होता है।
वैसे भी राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही कभी स्थाई नहीं होती। गहलोत और पायलट दोनों ही यह बात अच्छी तरह जानते भी हैं और समझते भी हैं।
मध्य प्रदेश में भाजपा से आए लोगों को कांग्रेस ने जी खोलकर टिकट दिए हैं। सफल कितने होंगे, यह परिणाम आने पर पता चल सकेगा। बहरहाल कांग्रेस ने पहले बाँटे कुछ टिकट बदले भी हैं। पहली सूची में एनपी प्रजापति का टिकट काट कर पार्टी ने चौंका दिया था लेकिन अब उन्हीं प्रजापति को टिकट दे दिया गाया है। छत्तीसगढ़ के चुनाव मैदान में अब तक कांग्रेस ज़रूर बेख़ौफ़ दिखाई दे रही है, लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान में मुक़ाबला काँटे का लग रहा है।
इन दोनों ही राज्यों में अभी कोई यह कह सकने की स्थिति में नहीं है कि आख़िर जीतेगा कौन? कारण सीधा सा है कि मप्र और राजस्थान में भाजपा ने अपने स्थापित दोनों ही चेहरों को भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रचारित नहीं किया है। कांग्रेस में ज़रूर स्थिति साफ़ है, लेकिन मैदान कितना साफ़ है, यह अभी से नहीं कहा जा सकता।