आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : शांति का नोबेल प्राइज 2023 ईरान की महिला पत्रकार और एक्टिविस्ट नरगिस मोहम्मदी को मिला है। नोबेल की कमेटी ने माना है कि उन्होंने महिलाओं की आजादी और उनके हक के लिए आवाज उठाई है। वो 13 बार गिरफ्तार भी हुईं।

51 साल की नरगिस अब भी ईरान की जेल में कैद हैं। उन्हें 31 साल की जेल और 154 कोड़ों की सजा सुनाई गई है। ईरान ने उनको सरकार के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया है। नोबेल मिलने के बाद नरगिस को 8.33 करोड़ का इनाम और एक गोल्ड मेडल दिया जाएगा।

नरगिस ने एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम व्हाइट टॉर्चर है। इस किताब में उन्होंने ईरान की जेल में कैद महिलाओं के इंटरव्यू लिखे हैं। 2022 में उन्हें रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के साहस पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

अब तक 111 लोगों को मिला शांति का नोबेल

नोबेल पीस प्राइज की शुरुआत 1901 में हुई थी। अब तक ये सम्मान 111 लोग और 30 संस्थाओं को मिला है। इससे पहले कई बार महात्मा गांधी को 5 बार नॉमिनेट होने के बाद भी नोबेल प्राइज न मिलने पर सवाल उठ चुके हैं।

1937 में नोबेल प्राइज कमेटी के एडवाइजर रहे जेकब वॉर्म-मुलर ने कहा था- गांधी एक स्वतंत्रता सेनानी, आदर्शवादी, राष्ट्रवादी और तानाशाह हैं। वो कभी एक मसीहा लगते हैं, लेकिन फिर अचानक एक आम नेता बन जाते हैं। वो हमेशा शांति के पक्ष लेने वालों में नहीं रहे। उन्हें पता होना चाहिए था कि अंग्रेजों के खिलाफ उनके कुछ अहिंसक अभियान हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे।

जेकब की इस रिपोर्ट के बाद कमेटी ने महात्मा गांधी को शांति के लिए नोबेल प्राइज नहीं देने का फैसला किया। ये इकलौता मौका नहीं था, इसके बाद भी 4 बार और 1938, 1939, 1947 और 1948 में गांधी को नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया गया था। हालांकि, हर बार उनके नाम छांट दिया गया।

इस स्टोरी में जानेंगे कि कैसे गांधी के बताए रास्ते पर चलकर मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला और दलाई लामा ने नोबेल पीस प्राइज जीता, लेकिन करीब 35 करोड़ भारतीयों को बिना हिंसा आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी को ही ये सम्मान नहीं मिला।

बापू को 1937 से 1939 तक नॉर्वे के सांसद ओले कॉल्बजॉर्नसेन ने नोबेल प्राइज के लिए नॉमिनेट किया था। इस नॉमिनेशन के जवाब में नोबेल कमेटी के जेकब ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि गांधी एक अच्छे, महान और तपस्वी व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने अपनी नीतियों में कई बार तीखे बदलाव किए।

मुलर के मुताबिक, साउथ अफ्रीका में गांधी ने भेदभाव के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी वो वहां प्रताड़ित हो रहे अश्वेत लोगों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ भारतीयों के लिए थी।

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन की वजह से गांधी को नहीं मिला नोबेल

1939 के 8 साल बाद जब देश आजाद हुआ तो एक बार फिर गांधी को नोबेल देने की मांग उठी। 1947 में गांधी को 3 लोगों ने मिलकर फिर से नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया। उस नोबेल प्राइज कमेटी ने इस सम्मान के लिए 6 लोगों को शॉर्टलिस्ट किया था, जिसमें गांधी का भी नाम था। हालांकि, उस वक्त नोबेल कमेटी के एडवाइजर रहे जेन्स आरुप सेइप की रिपोर्ट में गांधी की सराहना थी, लेकिन उन्हें पूरी तरह से इस सम्मान का हकदार नहीं बताया गया।

इसकी एक बड़ी वजह थी भारत-पाकिस्तान विभाजन। नोबेल कमेटी में मौजूद 5 में से 3 मेंबर इस बात के पक्ष में थे कि पार्टीशन और दंगों के बीच गांधी को ये अवॉर्ड नहीं दिया जा सकता। विभाजन के वक्त देशभर में घूम-घूम कर दंगे रोकने की अपील कर रहे गांधी एक बार फिर नोबेल से चूक गए। 1947 का नोबेल प्राइज क्वेकर संस्था को दिया गया।

इसके बाद 1948 में गांधी को कुल 6 लोगों ने नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया। इस बार के नॉमिनेशन में खास बात ये थी कि इनमें से 2 क्वेकर संस्था और एमिली ग्रीन बाल्च को 1946 और 1947 का नोबेल पीस प्राइज मिला था।