नई दिल्ली..पिछले 10 सालों में में आपसी शूटआऊट एवं आत्महत्याओं के मामलों में बढ़ोतरी हुई है जैसा कि माननीय गृह राज्य मंत्री का संसद में दिया गया बयान कि आपसी शूटआऊट व आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. जैसा कि माननीय गृह राज्य मंत्री का संसद में दिया गया बयान कि पिछले 10 सालों में 1200 से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों ने आत्म हत्याएं की है,यानी हर दुसरे तीसरे दिन एक आत्महत्या की घटना घटी । तकरीबन हर साल 10 हजार अर्द्धसैनिक बलों के जवान या तो वालंटियर रिटायरमेंट ले लिए या नौकरी छोड़ दिए ये सिलसिला बदस्तूर जारी है।
रणबीर सिंह महासचिव के अनुसार एक जवान को भर्ती करने के बाद एक साल की ट्रेनिंग का खर्चा तकरीबन 15 लाख से अधिक बैठता है जिसमें उसकी मिलने वाली तनख्वाह, वर्दी एक्युपमैंट उच्च दर्जे के आधुनिक हथियारों की सिखलाई, अन-आर्मड कॉम्बैट,भीड़ कंट्रोल, अचानक आने वाली प्राकृतिक विपदाओं में आम जान माल की सुरक्षा हेतु विशेष ट्रेनिंग, आगजनी दंगा फसाद से निपटना, नक्सलियों, उग्रवादियों दहशतगर्दो से निपटना, वीवीआईपी सुरक्षा ओर ना जाने कितने किस्म की सिखलाई तब जाकर 1 साल में सिपाही तैयार होता है।
अहम मुद्दा आत्महत्याओं व आपसी शूटआऊट को लेकर है। जवानों की ड्यूटी के घंटों में इजाफा हुआ है बॉर्डर, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों व प्राक्सी वार से प्रभावित काश्मीर में बामुश्किल से 4-5 घंटे आराम के लिए मिलते हैं ओर दिन में भी चैन कहां। सुबह 6 बजे पीटी मार्का परेड फिर 9 बजे आधुनिक हथियारों की ट्रेनिंग जो कि लंच से पहले तक चलती हैं उसके बाद फिर 2 बजे दोपहर फटीक, घास सरकंडे काटना कैम्पस साफ सफाई ,शाम 4 बजे गेम मार्का ओर शाम 6 बजे से फिर पुरी रात के लिए चाक चौबंद चौंकिदारीं। ये हैं जवानों की दैनिक दिनचर्या। अब घर परिवार बुड्ढे मां बाप, बीवी बच्चों की सुध कब ले।
जब छुट्टी जाने का समय आए तो बेमौसम चुनाव, प्राकृतिक विपदाएं, दंगा फसाद के चलते उसकी छुट्टी का प्लान पुरी तरह से फेल हो चुका होता है। जवानों की बीवी बच्चों पर शरारती तत्वों की छेड़छाड़,जमीन जायदाद पर दबंगों का नाजायज कब्जा,वृद्ध मां बाप का इलाज,बच्चों की शिक्षा और धर्म-पत्नियों की शिकायतों का लम्बा चौड़ा चिठ्ठा जवानों की दिनचर्या पर काफी असर डालता है। मत भुलियेगा यही हाल फोर्सेस के सहायक कमांडेंट,डिप्टी कमांडेंट व कमांडेंट का है जो जवानों की समस्याओं को लेकर, लम्बे समय से प्रमोशन से वंचित,मनचाहा ट्रांसफर ना मिलने के एवज में तनाव में जी रहे होते हैं। इस के बीच कोई भी अनहोनी हो जाए तो उसका ठीकरा सिनियर के सर मढ़ दिया जाता है।
बल में निम्न कमेरे वर्ग फोलोवर्स, सिपाही,हवलदार,उपनिरीक्षक, निरिक्षकों व कमांडिंग ऑफिसर के बीच बढती खाई यानी आपसी संवाद की कमी भी विवादों एक बड़ा कारण बन जाता है। जवानों की भावनाओं को नजरंदाज करना, उच्च अधिकारियों द्वारा अपने मातहत कर्मचारियों को हेय दृष्टि से देखना, रूखा व्यवहार करना,आपसी तालमेल की कमी,कम्पनी के सीनियर जवानों के द्वारा परिवार व खास कर पत्नियों के बारे में फिक्रे कसना भी जवान के मानसिक तनाव के कारण बनते हैं। कई मर्तबा अल्कोहल का बहुतायत मात्रा में सेवन जो कि अक्सर आकस्मिक अनहोनी/ शुट-आउट का कारण बन जाती है। सैक्सन कमांडर, प्लाटून हवलदार व उप निरीक्षक को जवान द्वारा की गई अर्जी व शिकायत को इग्नोर करना या हल्के में लेना हादशे का कारण बन जाते हैं।
ऊपर से जरूरी मूलभूत सुविधाएं की भारी कमीं, लम्बे समय तक प्रमोशन का ना मिलना, असामायिक ट्रांसफर, घर परिवार से लम्बे समय तक दूर , रहना,उच्च अधिकारियों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाना साथ ही 40,/40 साल देश सेवा के बाद भी पेंशन से वंचित किया जाना जवानों के मानसिक तनाव के बड़े कारण है। जिसके चलते अक्सर सीआरपीएफ ट्रेनिंग सेंटर जैसी भयावह स्थिति पैदा हो जाती है।
इस पर माननीय गृह मंत्री द्वारा 100 दिनों की छुट्टी वाला फार्मूला पुरी तरह से फेल हो गया लगता है। आज सीआईएसएफ में जवानों को मात्र 30 दिनों की सालाना अवकाश मिलता है तो कैसे उसको 100 दिन अवकाश दे पाएंगे। जरूरी है कि इस संबंध में सीआईएसएफ जवानों के बीच एक ताजा सर्वे कराया जाए।
अफसरों की बदमिजाजी खतरनाक
वही केंद्रीय बलों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि सीनियर रैंकिंग आफसरों के द्वारा अपनी ही कम्पनी के जवानों के प्रति बहुत वहशियाना हरकत की जाती है। ऐसी वारदाते अक्सर देखने को मिलती हैं जैसा कि अभी पिछले दिनों बीएसएफ कमांडेंट द्वारा अपने सोते हुए निरीक्षक पर लात धूसों से प्रहार किया गया और इसके एवज में वह एम्स ट्रॉमा सेंटर में इलाज के लिए पीड़ित इंस्पेक्टर को जीवन मृत्यु के बीच संघर्ष करना पड़ा। पिछले दिनों एक सीआरपीएफ डीआईजी साहब द्वारा अपने मातहत मैस में काम करने वाले सिपाही के मुंह पर खौलता गर्म पानी उड़ेल दिया गया था। जिंसमे पीड़ित जवान बुरी तरह से झुलस गया था। जवानों के शोषण से जुड़े ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे जो कि प्रकाश में में नहीं आ पाते। यद्यपि सारे अफसर एक जैसे नहीं होते लेकिन इनमें 1 या 2 परसेंट है अफसर जो फोर्सेस के नाम पर धब्बा हैं। इनकी वजह से पिछले दिनों फोर्सेस खाशकर अर्द्धसैनिक बलों के जवानों में आपसी शूटआऊट व आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ी हैं।
सरकार के द्वारा इन परिस्थितियों में मानसिक तनाव से जूझते जवानों का तनाव कम करने के लिए मनोचिकित्सक की देखरेख में बड़े बड़े कैप्सूल कोर्स चलाए जाने का दावे किए गए। जो कि हकीकत में पुरी तरह से फेल रहे है। इन कारणों से पिछले दिनों में जवानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
माननीय गृह राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय व केंद्रीय गृह सचिव से मुलाकातों के दौरान कॉनफैडरेसन आफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा बराबर मांग की जाती रही है कि पिछले 20 सालों में हुईं केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आत्महत्याओं के बारे में श्वेत पत्र जारी करे सरकार कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में आपसी शूटआऊट व आत्महत्याओं के मामले क्यों घटित हो रहे है।
आंकड़ों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर के आतंक प्रभावित इलाकों से लेकर नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात सीआरपीएफ के 950 जवान तीन वर्षों में ड्यूटी के दौरान शहीद हुए हैं. वहीं जवानों की आत्महत्या के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 में 153 जवानों ने आत्महत्या की है. इसमें से 56 जवान सीआरपीएफ के और 42 जवान बीएसएक के थे. नक्सल प्रभावित इलाकों में शहीद होने वाले जवानों की संख्या 57 फीसदी है. सभी बलों के जवानों को मिला लें तो साल 2019 में 15 गजटेड अफसर समेत 622, 2020 में 14 गजटेड अफसर समेत 691 व साल 2021 में 18 गजटेड अफसर समेत 729 जवान शहीद हुए हैं.
2015-20 के बीच 680 कर्मियों की मौत,गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2015 से 2020 के 6 वर्षों में मुठभेड़ों की तुलना में बीएसएफ, सीआरपीएफ और एसएसबी सहित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवानों की आत्महत्या से ज्यादा मौतें हुई हैं. 2015-2020 के बीच आत्महत्या से लगभग 680 कर्मियों की मौत हुई, जबकि मुठभेड़ मे 323 कर्मी शहीद हुए. यानी जवानों में आत्महत्या के मामले शहादत से दोगुने से भी ज्यादा थे.