लगभग पूरे मध्यप्रदेश में भाजपा भले जीत की खुशी से फूली नहीं समा रही हो, लेकिन भविष्य में उसके लिए एक राजनीतिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। आज तो हो सकता है भाजपा इस चुनौती को आवश्यक गंभीरता से न ले, मगर सियासत का रंग ऐसे ही धीरे धीरे या अचानक बदलता है।
यहां जिक्र आम आदमी पार्टी उर्फ़ आप पार्टी का हो रहा है ,जिसके सर्वे सर्वा अरविंद केजरीवाल हैं, जिनके नेतृत्व में दिल्ली में आप पार्टी की सरकार ने बहुत पहले से ओर पंजाब में भगवंत मान की मुखियाई में सरकार ने भाजपा को बैचेन कर रखा है। यह सब इसलिए लिखना पड रहा है कि मध्य प्रदेश में हाल में संपन्न स्थानीय निकाय चुनावों में आप पार्टी ने जीत दर्ज करवाकर एक तरह से भाजपा को चिंतित करने वाली स्थिति पैदा कर दी है।
राजनीति में दावे से तो कुछ नहीं कहा जा सकता धीरे धीरे बदलाव की उम्मीद तो की ही जा सकती है लेकिन पूरे प्रदेश इस बार के निकाय चुनावों में भी लगभग हर नगर नगर भाजपा ही फिर से छाई रही लेकिन विंध्य प्रदेश में आप पार्टी की धमाकेदार जीत ने राजनीतिक सूरमाओं को भी हैरत में डाल दिया है। हरदम राजनीतिक बदलाव के गवाह रहे इस क्षेत्र के सिंगरौली शहर में न सिर्फ आप पार्टी का महापौर प्रत्याशी जीता बल्कि पांच पार्षद भी आप पार्टी के ही जीते। इतिहास में जाएं तो पता चलेगा कि मध्यप्रदेश की सरकार पर मुख्य रूप से कांग्रेस या संविद या जनता पार्टी या जनसंघ या भाजपा का ही कब्जा रहा है। बावजूद इसके विंध्य अंचल के बारे में सामान्य धारणा रही कि इस इलाके के अति पिछड़े, दबे, कुचले होने के कारण यहां कभी समाजवादी दल और कभी वाम पंथी दल ओर कभी बसपा का अच्छा खासा दबदबा रहा।
माना जाता है कि विंध्य में न सिर्फ़ वैचारिक विविधता रही बल्कि राज्य में नई राजनीति की इबारत भी यहीं से लिखी गई । दीगर बात है कि इस सियासत का सफर नामा किन्हीं कारणों से हरदम अधूरा रहा। जिस प्रकार से कपड़ा मिलों के कारण इन्दौर कभी सोशलिस्ट और वामपंथी दलों का किला रहा उसी तरह सामाजिक आर्थिक बदलाव की बैचेनी के अंतर्गत विंध्य उक्त दोनों दलों का गढ़ रहा।
विधानसभा के 1952 के चुनावों में मंगवा से समाजवादी दल के श्री निवास तिवारी विधायक चुने गए। उसके बाद 1977 में जमुना प्रसाद शास्त्री रीवा सीट से सांसद चुने गए। इसके पहले इसी सीट से 1957 में जगदीश चन्द्र जोशी विधायक चुने जा चुके थे। इसके अलावा सोशलिस्ट पार्टी के कई अन्य उम्मीदवार इस क्षेत्र की सीटों से जीते ।खास बात यह है कि भाजपा उर्फ जनसंघ का इस इलाके में शुरू से ही कोई खास असर नही रहा। उसे यहां स्थापित होने में खासी मशक्कत करनी पड़ी।
वैसे जनता दल और वामपंथी दल के विधायकों को भी यहां से फतेह मिली। भाकपा से पहले विधायक विश्वम्भर प्रसाद पांडे थे तो माकपा से सिरमौर सीट पर रामलखन शर्मा ने माकपा के टिकट पर विधायक का चुनाव जीता। आगे के सालों में खासकर यूपी, बिहार, हरियाणा, पंजाब और मध्यप्रदेश में दलितों और पिछड़ों के आधुनिक डॉक्टर बाला साहब अम्बेडकर कहे जाने वाले स्वर्गीय कांशीराम का अवतरण हुआ।
जिन्होंने नई पार्टी बसपा का गठन किया। जिसके पहले सांसद विंध्य से ही चुने गए, जिनका नाम भीमसिंह था। वे बसपा के मध्यप्रदेश से पहले सांसद थे। इसके बाद देवराज पटेल, बुद्धसेन पटेल चुने गए। समाजवादी पार्टी को भी मतदाताओं ने मौका दिया। विधानसभा के 2003 के चुनाव में सीधी से गोपाद बनास, कृष्णकुमार, देवसर से वंशमनी वर्मा और मेहर से नारायण त्रिपाठी चुनाव जीते।
जानकारों का मानना है कि आम आदमी उर्फ आप पार्टी की यह धमक फिलहाल भले ही छोटी हो लेकिन इसी धमक ने भाजपा रणनीतिक कारो को विंध्य प्रदेश में नई जमीन तैयार करने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। सिंगरौल में आप पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल रोड शो करने जब आये थे तब उन्होंने कहा भी था कि यदि सिंगरौली से आप पार्टी का महापौर जीतता है तो वे भविष्य के बारे में सोचेंगे। याद रखे कि पंजाब में आप पार्टी की एंट्री चंडीगढ़ के स्थानीय चुनाव में जीत से ही हुई थी और आगे चलकर उसने विधानसभा का किला जीत लिया। माना जा रहा है कि आप पार्टी के रूप में मध्यप्रदेश में तीसरा विकल्प उभर सकता है।