आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : वाराणसी की अशोक विहार कॉलोनी में एक नर्सिंग होम है…काशी मेडिकेयर। एक दिन एक आदमी भागते हुए अपनी पत्नी को वहां लेकर पहुंचा। उसकी पत्नी मां बनने वाली थी। डॉक्टर आईं। महिला को ओपीडी में ले गईं। नॉर्मल डिलीवरी पॉसिबल नहीं थी, इसलिए डॉक्टर को उसका ऑपरेशन करना पड़ा। महिला का परिवार बहुत उम्मीदों से डॉक्टर का ऑपरेशन थिएटर से बाहर आने का इंतजार कर रहा था।

डॉक्टर बाहर आईं। उन्होंने बताया, ‘सब कुछ ठीक रहा। बेटी हुई है।’ यह सुनते ही परिवार खुश होने की बजाय मायूस हो गया। अस्पताल की फीस जमा करने की बात हुई, तो बच्ची का पिता बोला कि एक तो लड़की हुई है ऊपर से पैसा भी जमा करना पड़ेगा। तभी डॉक्टर वहां आईं और उन्होंने परिवार से कहा कि लड़की हुई है, इसलिए आपको एक रुपए भी जमा नहीं करना है।

वो डॉक्टर हैं शिप्रा धर श्रीवास्तव। शिप्रा के हॉस्पिटल का स्लोगन है, ‘बेटी नहीं है बोझ, आओ बदलें सोच।’ इस नवरात्रि 9 दिन, 9 नारियां सीरीज में आज की कहानी डॉक्टर शिप्रा धर श्रीवास्तव की है। शिप्रा बेटी पैदा होने पर मरीज से पैसे नहीं लेती। वह ऐसा क्यों करती हैं? उनके दिमाग में यह सोच कहां से आई? इस फैसले के बाद किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? आइए सब कुछ शुरू से जानते हैं…

पिता ने कहा, मैं मर जाऊं तो बेटी को नानी के घर भेज देना

मऊ जिले के धरनी धर श्रीवास्तव के घर एक लड़की का जन्म हुआ। नाम रखा शिप्रा श्रीवास्तव। शिप्रा अपने घर की अकेली बेटी थीं। पिता झारखंड के धनबाद जिले में इंजीनियर थे। वो चाहते थे कि शिप्रा बड़ी होकर उनकी तरह ही इंजीनियर बने। माता-पिता ने शिप्रा के बचपन से ही उनकी पढ़ाई के लिए पैसे इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। सब अच्छा चल रहा था।

लेकिन एक दिन शिप्रा के पिता की तबीयत अचानक से खराब हो गई। उनकी मां अपनी दो साल की बच्ची को लेकर अस्पताल भागीं। पिता को एडमिट कराया, तो पता चला कि उन्हें ब्रेन हेमरेज है। वो अब बस कुछ दिन ही जिंदा रह पाएंगे। शिप्रा बताती हैं कि मेरी मां उस वक्त बहुत परेशान रहने लगीं थीं। घर का खर्च, पापा की दवाइयों का खर्च और मेरे भविष्य की चिंता…मां के लिए जिंदगी बहुत मुश्किल हो गई थी।

कुछ दिन बीते। पापा की हालत बिगड़ी तो उन्हें मेरी चिंता होने लगी। उन्हें लगा कि मेरी मां अकेली हैं। उन्हें कुछ हो गया तो मां कैसे मेरी पूरी जिम्मेदारी संभालेंगी। उन्हें फिक्र होने लगी कि कहीं ऐसा ना हो कि उनके बाद मैं घर की चहारदीवारी में कैद रह जाऊं। मेरी पढ़ाई ना हो पाए। इसलिए एक दिन उन्होंने अपने एक दोस्त को घर बुलाया।

पापा ने अपने दोस्त से कहा कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो मुझे और मां को नानी के घर पहुंचा दें। मेरी दादी का घर देवरिया जिले के एक गांव में था। इसलिए पापा नहीं चाहते थे कि उनके बाद हम वहां जाएं क्योंकि उन्हें लगता था कि वहां मेरी पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाएगी। इसलिए उन्होंने हमें नानी के घर भेजने के लिए कहा क्योंकि वो शहर में रहती थीं और वहां मेरी पढ़ाई बेहतर ढंग से हो पाती।

शिप्रा बताती हैं कि इसके कुछ दिन बाद ही उनके पिता की मौत हो गई। उस वक्त वह इतनी छोटी थी कि कुछ भी ठीक से याद नहीं। पापा की सब कहानियां मां से ही सुनी हैं। पिता की मौत के बाद उनके दोस्त ने अपना वादा निभाया और शिप्रा और उनकी मां को नानी के घर छोड़ दिया। शिप्रा का पूरा बचपन अपनी नानी के घर में ही बीता है।

मां बीमार रहती थीं इसलिए शिप्रा ने डॉक्टर बनने का फैसला किया

शिप्रा बताती हैं कि नानी के घर ही उनकी पूरी पढ़ाई हुई। वो कहती हैं कि अपने आस-पास मैं लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव देखती थी, लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं बचपन से ही पढ़ने में अच्छी थी, इसलिए मेरी मां मेरी पढ़ाई का पूरा ध्यान रखती थीं। पापा चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं, लेकिन मेरा मन किसी और चीज में लगा था।

मुझे बचपन से ही लोगों की सेवा करना अच्छा लगता था। मैं चाहती थी कि बड़ी होकर कुछ ऐसा करूं, जिससे लोगों का फायदा हो सके। लेकिन मैंने सोचा नहीं था कि क्या करना है। तभी अपनी मां को देखकर मेरे मन में डॉक्टर बनने का ख्याल आया। मेरी मां बहुत बीमार रहती थीं। बार-बार उन्हें डॉक्टर के पास ले जान पड़ता। उन्हें देखकर मुझे लगता कि अगर मैं डॉक्टर होती तो अपनी मां को ठीक कर पाती।

अपनी मां के लिए ही मैंने तय किया कि मुझे डॉक्टर बनना है। मैंने साल 2000 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमडी की पढ़ाई की। इसी बीच डॉक्टर एम.के. श्रीवास्तव से मेरी शादी हो गई। बाद में हमने मिलकर वाराणसी की अशोक विहार कॉलोनी में काशी मेडिकेयर नाम से एक नर्सिंग होम खोला।

बेटे के पैदा होने पर खुश तो बेटी पैदा होने से दुखी होते थे लोग