सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : दक्षिण एशिया में कनेक्टिविटी और व्यापारिक गलियारों को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है। एक ओर चीन अपने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के जरिए क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, वहीं भारत भी पड़ोसी देशों के साथ सड़क और व्यापारिक संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रहा है।

इसी क्रम में भारत समर्थित एक महत्वपूर्ण सड़क संपर्क परियोजना चर्चा में है, जिसे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिहाज से गेमचेंजर माना जा रहा है। यह कॉरिडोर भारत, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर क्षेत्र को बेहतर संपर्क देने के साथ व्यापक क्षेत्रीय व्यापार को भी बढ़ावा देने का माध्यम बन सकता है।

क्या है 1300 किमी कनेक्टिविटी नेटवर्क की अवधारणा?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय से दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सड़क संपर्क मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत को क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाना भी है।

यह रणनीति भारत, बांग्लादेश, म्यांमार और अन्य पड़ोसी क्षेत्रों के बीच बेहतर सड़क संपर्क विकसित करने पर आधारित है। इससे माल परिवहन की लागत घटेगी और व्यापारिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी।

बांग्लादेश क्यों है इस परियोजना का अहम हिस्सा?

बांग्लादेश इस पूरी कनेक्टिविटी रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जा रहा है। भारत समर्थित कई सड़क और परिवहन परियोजनाओं पर वहां काम चल रहा है। कुमिल्ला-ब्रह्मनबरिया फोर-लेन हाईवे जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य भारत और बांग्लादेश के बीच माल परिवहन को आसान बनाना है।

विश्लेषकों का मानना है कि बेहतर सड़क संपर्क से चटगांव बंदरगाह और पूर्वोत्तर भारत के बीच व्यापारिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इससे बांग्लादेश को भी आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है।

CPEC से कैसे अलग है भारत का मॉडल?

चीन का CPEC मुख्य रूप से चीन को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ता है। इसके विपरीत भारत की रणनीति बहुपक्षीय क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और आर्थिक एकीकरण पर केंद्रित है।

भारत की परियोजनाओं का उद्देश्य पड़ोसी देशों के साथ परिवहन नेटवर्क, व्यापारिक मार्ग और लॉजिस्टिक सुविधाओं को मजबूत करना है, ताकि क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ सके। विशेषज्ञ इसे "कनेक्टिविटी आधारित कूटनीति" का हिस्सा मानते हैं।

पूर्वोत्तर भारत को मिलेगा बड़ा फायदा

नई सड़क और कनेक्टिविटी परियोजनाओं से पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। लंबे समय से भौगोलिक चुनौतियों का सामना कर रहे इस क्षेत्र को दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से सीधे जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

सरकार पहले से ही सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक राजमार्गों और संपर्क परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है। अरुणाचल प्रदेश में विकसित हो रहा फ्रंटियर हाईवे भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

क्षेत्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा असर

कनेक्टिविटी परियोजनाएं केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं होतीं। इनका असर व्यापार, निवेश, रणनीतिक साझेदारी और भू-राजनीति पर भी पड़ता है। दक्षिण एशिया में चीन और भारत दोनों अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत की कनेक्टिविटी योजनाएं समय पर पूरी होती हैं तो इससे क्षेत्रीय व्यापार के नए अवसर खुलेंगे और पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

निष्कर्ष

1300 किलोमीटर लंबी कनेक्टिविटी परियोजना को केवल सड़क निर्माण परियोजना के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे दक्षिण एशिया में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक सोच का हिस्सा माना जा रहा है। CPEC के समानांतर भारत क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और सहयोग का ऐसा मॉडल विकसित करना चाहता है जिसमें कई देशों को साझा लाभ मिले। आने वाले वर्षों में यह परियोजना दक्षिण एशिया के आर्थिक और रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।


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