नई दिल्ली । एकाग्रता की कमी और अत्यधिक एक्टिविटी यानी अटेंशन डेफिसिट/ हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) से ग्रसित बच्चों को फल- सब्जियां पर्याप्त खिलाने से उनकी एकाग्रता में सुधार आता है। एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में एकाग्रता की कमी एक मुख्य लक्षण है और इसके कारण ने किसी विषय-वस्तु (सब्जेक्ट मैटर) पर ध्यान केंद्रित या फोकस नहीं कर पाते हैं। उन्हें कुछ भी याद करने या रखने में मुश्किल होती है। इसके साथ ही भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं।
अमेरिका में द ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में ह्यूमन साइंसेज डिपार्टमेंट की एसोसिएट प्रोफेसर आइरिन हत्सु ने बताया कि इस स्टडी में ये दिखा है कि जिन बच्चों ने ज्यादा फल-सब्जियों का सेवन किया, उन बच्चों में एकाग्रता की कमी के गंभीर लक्षणों में कमी आई। उनका कहना है कि फल और सब्जियों समेत हेल्दी डाइट एडीएचडी के लक्षणों को कम करने का एक बेहतर तरीका है।
रिसर्च टीम ने एडीएचडी लक्षणों वाले 134 बच्चों के पेरेंट्स से एक प्रश्नावली भरवाई, जिसमें 90 दिनों में बच्चों के सामान्य खानपान का विस्तृत विवरण हासिल किया गया। आइरिन हत्सु के अनुसार, विशेषज्ञों का मानना है कि एडीएचडी का संबंध ब्रेन में कुछ न्यूरोट्रांसमीटरों का कम स्तर होने से है। विटामिन और मिनरल्स शरीर को उन महत्वपूर्ण न्यूरोकेमिकल्स बनाने और ब्रेन के सभी कामों में मदद करने में सह-कारक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने बताया कि जब कोई भी व्यक्ति भूखा होता है, तो वह परेशान होता है और खीझता है। एडीएचडी से पीड़ित बच्चे भी इस मामले में कुछ अलग नहीं होते हैं। ऐसे में यदि उन्हें पर्याप्त खाना नहीं मिले, तो बीमारी के लक्षण और बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही, जब पेरेंट्स अपने बच्चों के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं, तो वे भी परेशान होते हैं और फिर घर में पारिवारिक तनाव का वातावरण बन जाता है। ऐसी स्थिति में एडीएचडी से ग्रस्त बच्चों में बीमारी के लक्षण बढ़ने लगते हैं।
रिसर्चर आइरिन हत्सु का कहना है कि हमारी स्टडी का सुझाव है कि बच्चों को दवा देने से पहले इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए कि उनकी डाइट की गुणवत्ता क्या है, क्या वे जो खा रहे हैं, उसका संबंध कहीं रोग के लक्षण बढ़ने से तो नहीं है। यदि ऐसा हो तो डाक्टरों को चाहिए कि दवा की डोज बढ़ाने से पहले, खानपान में सुधार पर जोर दें और उसके असर का आकलन करें।
हत्सु बताती हैं कि आमतौर पर देखा गया है कि जब बच्चों में एडीएचडी के लक्षण बढ़ जाते हैं, तो पेरेंट्स उसे डाक्टर के पास ले जाते हैं और डॉक्टर बढ़ते लक्षणों को देखते हुए दवाइयों की डोज बढ़ा देते हैं। मालूम हो कि आजकल के लाइफस्टाइल में फास्ट-फूड के बढ़ते इस्तेमाल ने डाइट में फल-सब्जियों की खपत कम कर दी है। इसकी वजह से शरीर में कई तरह के नेचुरल न्यूट्रिएंट्स की कमी हो जाती है और लोग तरह-तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। ऐसे में इलाज के दौरान डॉक्टर जब उन्हें फल-सब्जियां खाने की सलाह देते हैं, तब इसका महत्व समझ में आता है।