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बिजनौर। उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला गन्ने की खेती, चीनी मिलों और विविध सामाजिक संरचना के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान रखता है। यहां चुनावी नतीजों पर खेती-किसानी के मुद्दों के साथ जातीय समीकरण, मुस्लिम और दलित मतदाताओं की भूमिका तथा प्रमुख राजनीतिक दलों की रणनीति का असर दिखाई देता है। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच जिले की राजनीतिक तस्वीर फिर चर्चा में है। गन्ना किसान और भुगतान के मुद्दे अहम, बिजनौर की अर्थव्यवस्था में गन्ने की खेती महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चीनी मिलें, गुड़ उत्पादन और ग्रामीण कारोबार बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका से जुड़े हैं। किसानों के लिए गन्ने का उचित मूल्य, बकाया भुगतान, सिंचाई और खेती की बढ़ती लागत प्रमुख मुद्दे हैं। राजनीतिक दलों के लिए ग्रामीण मतदाताओं का भरोसा हासिल करने में इन समस्याओं पर उनका रुख महत्वपूर्ण हो सकता है।
मुस्लिम और दलित मतदाताओं की अहम भूमिका जिले में मुस्लिम और दलित समुदायों की उल्लेखनीय आबादी है। इनके अलावा जाट, चौहान, त्यागी और अन्य पिछड़े वर्गों के मतदाता भी अलग-अलग क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। हालांकि, किसी समुदाय के सभी मतदाताओं का एक ही पार्टी के पक्ष में मतदान करना तय नहीं है। स्थानीय उम्मीदवार, विकास के मुद्दे, गठबंधन और चुनावी परिस्थितियां भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करती हैं। आठ विधानसभा सीटों पर बदलता रहा मुकाबला बिजनौर जिले में आठ विधानसभा सीटें हैं—बिजनौर, चांदपुर, नूरपुर, धामपुर, बढ़ापुर, नगीना, नजीबाबाद और नहटौर। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और समाजवादी पार्टी ने चार-चार सीटों पर जीत दर्ज की थी। कुछ सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहा, जिससे स्पष्ट होता है कि जिले की सभी सीटों पर एक जैसा राजनीतिक रुझान नहीं है। चंद्रशेखर आजाद की जीत ने बढ़ाया राजनीतिक महत्व 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर आजाद की जीत ने बिजनौर क्षेत्र की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ा। इस परिणाम ने दलित राजनीति और नए राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका को चर्चा में ला दिया। आने वाले चुनाव में उनकी पार्टी का प्रभाव कितना बढ़ेगा, यह उम्मीदवारों, संगठन और स्थानीय मुद्दों पर निर्भर करेगा।
हार-जीत का गणित किन मुद्दों से बनेगा? 2027 के विधानसभा चुनाव में बिजनौर की राजनीतिक दिशा तय करने में कई कारक महत्वपूर्ण हो सकते हैं:
किसानों के मुद्दे: गन्ना भुगतान, फसल का मूल्य और कृषि लागत। सामाजिक समीकरण: मुस्लिम, दलित, जाट और अन्य समुदायों का मतदान रुझान।
राजनीतिक गठबंधन: भाजपा, सपा, बसपा, रालोद और आजाद समाज पार्टी की रणनीति। स्थानीय उम्मीदवार: क्षेत्र में उनकी छवि, जनसंपर्क और कामकाज। विकास के सवाल: सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और ग्रामीण सुविधाएं। बिजनौर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां जीत का कोई एक स्थायी फार्मूला नहीं है। अंतिम नतीजों पर स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और विभिन्न सामाजिक समूहों के मतदान व्यवहार का संयुक्त प्रभाव पड़ सकता है।
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