सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर 48 घंटे के अंदर बूथ वाइज वोटिंग डेटा और फॉर्म 17सी डेटा अपलोड करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। TMC नेता महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने यह याचिका लगाई थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की वेकेशन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोकसभा चुनाव के 5 फेज की वोटिंग हो चुकी है। बेंच ने कहा- अब सिर्फ दो फेज की ही वोटिंग बाकी हैं। ऐसे में डेटा अपलोडिंग के लिए मैनपावर जुटाना चुनाव आयोग के लिए मुश्किल होगा। चुनाव बाद रेगुलर बेंच मामले को देखेगी।
वोटिंग प्रतिशत में फर्क आने पर याचिका लगाई गई
लोकसभा चुनाव शुरू होने के बाद वोटिंग के दिन चुनाव आयोग वोटर टर्नआउट जारी करता है। इसके कुछ दिन बाद वह इस फेज के फाइनल डेटा जारी करता है। कांग्रेस, ADR और तृणमूल ने दोनों डेटा में अंतर आने के बाद ही सवाल उठाए और सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई।
याचिका के मुताबिक, चुनाव आयोग ने 19 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के 11 दिन बाद और 26 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के चार दिन बाद 30 अप्रैल को फाइनल वोटिंग पर्सेंट जारी किया था। इसमें वोटिंग के दिन जारी शुरुआती आंकड़े के मुकाबले वोटिंग पर्सेंट लगभग 5-6 प्रतिशत ज्यादा था।
चुनाव आयोग ने 22 मई को दिए हलफनामे में तीन बातें कही थीं
ADR ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि चुनाव आयोग मतदान होने के 48 घंटे के अंदर हर पोलिंग बूथ पर डाले गए वोटों का आंकड़ा जारी करे। ADR ने याचिका में फॉर्म 17 की स्कैन की हुई कॉपी भी चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड करने की मांग की थी। 17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा था। चुनाव आयोग ने तीन बातें कही थीं…
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एफिडेविट में कहा था कि फॉर्म 17सी (हर मतदान केंद्र पर डाले गए वोटों का रिकॉर्ड) के आधार पर वोटिंग डेटा का खुलासा करने से मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा होगा, क्योंकि इसमें बैलेट पेपर की गिनती भी शामिल होगी।
ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके आधार पर सभी मतदान केंद्रों का फाइनल वोटिंग डेटा जारी करने के लिए कहा जा सके। फॉर्म 17सी केवल पोलिंग एजेंट को दे सकते हैं। इसे किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को देने की अनुमति नहीं है। फॉर्म 17सी वह प्रमाण पत्र है, जिसे पीठासीन अधिकारी सभी प्रत्याशियों को प्रमाणित करके देता है।
आयोग ने कहा था कि कई बार जीत-हार का अंतर नजदीकी होता है। आम वोटर फॉर्म 17सी के अनुसार बूथ पर पड़े कुल वोटों और बैलेट पेपर को आसानी से नहीं समझ सकते। ऐसे में इसका इस्तेमाल गलत तरीके से चुनावी प्रक्रिया पर कलंक लगाने के लिए किया जा सकता है, जिससे मौजूदा चुनाव में अव्यवस्था फैल सकती है।