सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: हाई प्रोफाइल लोकसभा सीट अमेठी फिर सुर्खियों में है। 2019 में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को जितने वोट से हराया। 2024 में उससे 3 गुना मार्जिन से खुद हार गईं।
स्मृति जिन केएल शर्मा को कांग्रेस का प्रॉक्सी उम्मीदवार बता रही थीं, उन्होंने चुनाव जीतकर पूरे देश को चौंका दिया। पब्लिक की मानें तो 2019 का चुनाव स्मृति ‘दीदी’ बनकर जीत गई थीं। मगर 5 साल में कई दृश्य बदल गए।
जिन पुराने भाजपाइयों ने उन्हें चुनाव जिताया था। स्मृति उन्हीं से किनारा कर बैठीं। चुनाव में बड़े चेहरे तो अमेठी पहुंचे, मगर लोकल कार्यकर्ता डोर-टू- डोर प्रचार करने गए ही नहीं। इसकी वजह स्मृति से नाराजगी थी। बड़ी हार के कारणों को इस रिपोर्ट में पढ़िए…
हम अमेठी के गौरीगंज पहुंचे तो 3 बज चुके थे। हम सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां होटल पर कुछ लोगों का जमावड़ा था। लोग चाय की चुस्कियों के साथ लोकसभा चुनाव की चर्चा कर रहे थे। हमारी मुलाकात महेश सिंह से हुई। वह अमेठी के बड़े लकड़ी कारोबारी हैं।
अमेठी में स्मृति ईरानी को चुनाव लड़वाने वालों में शामिल रहे हैं। कहते हैं- प्रेशर पॉलिटिक्स अमेठी बर्दाश्त नहीं करती है। यहां प्रेम से आइए राजनीति करिए। इतने दिन गांधी परिवार के लोग राजनीति करते रहे। स्मृति भी 2019 में आईं तो दीदी बनकर जीती थीं, दबाव में नहीं जीती थीं। इसलिए दीदी बनकर रहिए दबाव क्यों बनाती हैं?
भाजपा कार्यकर्ता स्मृति के लिए फील्ड में नहीं निकले
यहीं हमारी मुलाकात ओपी सिंह से हुई। ओपी सिंह खाटी भाजपाई हैं, लेकिन स्मृति के साथ उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा। वह कहते हैं- 2014 में जब स्मृति अमेठी में चुनाव लड़ने आईं, तब हमने अपने घर में रहने के लिए जगह दी, लेकिन वह कार्यकर्ताओं से कहती हैं कि कोई हमें पूछने वाला नहीं था। हम सीमेंट के गोदाम में रहते थे। इस तरह की बात से हमारा मन खट्टा हो गया।
वह कहते हैं- हम अकेले नहीं हैं, ऐसे कई कार्यकर्ता हैं। जिनसे दीदी की दूरियां बढ़ती चली गईं। 2 साल से जिले को बाहरी नेताओं से चलवाया जा रहा था। पता नहीं क्यों…वह हम लोगों पर भरोसा नहीं कर पा रही थीं।
लोकल कार्यकर्ताओं को इज्जत नहीं मिली
स्टेशन से थोड़ी दूरी पर जय शंकर मिश्रा की जनरल स्टोर की दुकान है। जय शंकर कहते हैं- इस बार बाहर से आए नेताओं पर स्मृति ने फोकस किया। इससे लोकल कार्यकर्ता नाराज थे।
इन सबकी वजह से ही जो खाटी भाजपाई थे, वे भी छिटक गए। हम भी पुराने भाजपा के वोटर रहे हैं। अबकी बार हमने कांग्रेस को वोट किया। इसके अलावा भी कई कारण हैं। फ्री राशन देने से कोई फायदा नहीं होने वाला है। अगर एक फैक्ट्री लगाकर लोगों को नौकरी दी जाए तो उससे सभी का फायदा होगा।
लोग बोले- जीत के ओवर कॉन्फिडेंस में हार गईं स्मृति
रेलवे स्टेशन पर ही हमारी मुलाकात किट्टू चायवाला से हुई। किट्टू पहले दिल्ली में एक बड़े होटल में शेफ थे, लेकिन लॉकडाउन में नौकरी चली गई। इसलिए अमेठी वापस आए और डेढ़-दो साल पहले रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान चलाने लगे।
वह कहते हैं- मेरी दुकान पर शहर का लगभग हर युवा चाय पीने आता है। उनकी बातों को सुनता हूं तो लगता है कि उनके अंदर बेरोजगारी को लेकर आक्रोश है।