आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मणिपुर में हिंसा शुरू हुए 100 दिन हो चुके हैं। हर शहर-कस्बे की तस्वीर लगभग एक सी है- जली हुईं बस्तियां, टूटे हुए मकान और बंद पड़े बाजार। सूनी सड़कों पर अचानक कहीं से शोर आए तो समझो नया संघर्ष शुरू हो चुका है।

भास्कर रिपोर्टर ने मणिपुर के सबसे हिंसाग्रस्त 5 जिलों- इंफाल, बिष्णुपुर, चूराचांदपुर, तेंगनोउपल व कांगपोकपी का दौरा किया। मैदानों से पहाड़ों तक बंकरों व राहत कैंपों का जायजा लिया। यह ग्राउंड रिपोर्ट उसी आधार पर बनी है।

रिपोर्टर ने कांगपोकपी चौहारे का दौरा किया, जो राजधानी इंफाल से 42 किमी दूर है। मणिपुर को असम से जोड़ने वाले इकलौते हाईवे पर बसा यह शहर लकड़ी के सामान के लिए मशहूर है। लेकिन, आजकल यहां जगह-जगह मकानों का मलबा पड़ा है।

स्कूल-कॉलेज बंद हैं, या उनमें रिलीफ कैंप चल रहे हैं। 300 कैंपों में 40 हजार लोग हैं। कहीं-कहीं एक कमरे में 30-40 लोग ठूंसे गए हैं। ज्यादातर बच्चे और महिलाएं हैं। क्योंकि, युवा अपनी जाति या सोशल स्टेटस के नाम पर हथियार उठा चुके हैं। वे बंकरों में हैं या पुलिस की तरह नाका लगाकर डटे हैं। 160 मौतें हो चुकी हैं।

मैतेई और कुकी राहत कैंपों और बंकरों में कोई खास अंतर नहीं है। तरह-तरह के हथियार हैं। लेकिन, दोनों ही समुदायों के बच्चे कैंपों में हैं और महिलाएं सड़कों पर। ये महिलाएं कहीं सेना के काफिले रोककर अपने समुदाय के उपद्रवियों को बचा रही हैं तो कहीं सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में डटी हैं।

प्रशासनिक अफसर ग्राउंड पर नहीं हैं, दफ्तरों से भी गायब हैं। पिछले 100 दिनों में मणिपुर के हालात किस कदर खराब हो चुके हैं, पढ़िए पूरी ग्राउंड रिपोर्ट…

बच्चे दूध के लिए रोते हैं, बिस्किट खाकर सो रहे

दोपहर 2 बजे: कांगपोकपी में कुकी समुदाय के कैंप में कुछ बच्चे कैरम खेल रहे हैं। कुछ मोबाइल पर बिजी हैं। बिस्तर जमीन पर हैं। एक कोने पर मां से चिपककर सोता 4 साल का लुनमीनलाल नहीं जानता कि आखिर यहां चल क्या रहा है। लुनमीनलाल भूख से रो रहा था। दूध नहीं मिला तो मां ने बिस्किट खिलाकर सुला दिया।

शाम 4 बजे: बिष्णुपुर में एक मैतेई कैंप में बुजुर्ग दवा और महिलाएं सैनेटरी पैड का इंतजार कर रही हैं। सुबह सूचना मिली थी कि कोई मेडिकल किट लेकर आ रहा है, पर वह पहुंचा नहीं। कैंपों का यही हाल है।

शाम 6 बजे: कैंप में बच्चे पढ़ाई करने लगते हैं। किताबें हैं नहीं, इसलिए बड़े बच्चे अपनी समझ से छोटे बच्चों को कुछ पढ़ाने लगते हैं। हिंसा की वजह से नौकरी गंवाने वाले काकाई तोथांग कहते हैं- बचत भी खत्म हो गई है।