आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : दिल्ली के मालवीय नगर का हौज रानी इलाका। यहां 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत की राजकुमारी ने अपने नहाने के लिए कुंड बनवाया था। अब उसी हौज रानी इलाके में तालिबान की ज्यादतियों से बचकर भागीं फरिश्ता का बसेरा है। 23 अगस्त को जब भारत के चंद्रयान-3 ने चांद पर लैंड किया तो ताली बजाने वालों में फरिश्ता भी शामिल थीं, पर अपने मुल्क अफगानिस्तान को हर रोज बदहाली में जाते देख फरिश्ता भावुक हो जाती हैं।

उन्हें काबुल की वो गलियां याद आती हैं, जहां वो बचपन में अपने दोस्तों के साथ खेला करती थीं। फरिश्ता बताती हैं कि अब उन गलियों में तालिबान के लड़ाके तैनात हैं। वही तालिबानी लड़ाके जिन्होंने 3 साल पहले फौज में काम कर चुके फरिश्ता के पिता की बेरहमी से हत्या कर दी थी। 2021 में तालिबान के तख्तापलट के बाद अफगानिस्तान से भागकर भारत आने वालों में फरिश्ता अकेली नहीं हैं। बीते 2 साल में उनके जैसे 15 हजार से ज्यादा लोग यहां आए हैं।

आज इस स्टोरी में फरिश्ता समेत 2 किरदारों की कहानी के जरिए समझते हैं कि तालिबान के सत्ता में आने से उनकी जिंदगी कैसे बदल गई…

पूर्व फौजी पिता की मौत के बाद फरिश्ता भागकर भारत चली आईं

2019 की बात है। अफगानिस्तान में तालिबान तेजी से एक के बाद एक प्रोविंस पर कब्जा करता जा रहा था। अब तक काबुल उसके हाथ नहीं लगा था। फरिश्ता की मां भी सरकारी मुलाजिम थीं। पिता की हत्या करने के बाद एक दिन तालिबानियों ने उनकी मां पर भी हमला करवा दिया।

लिहाजा मां को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। फरिश्ता पर अपनी 2 बहनों और एक भाई को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी थी। वो उन्हें लेकर काबुल में अपने रिश्तेदार के घर चली गईं, ताकि तालिबानी लड़ाके उन्हें ढूंढ़ न सकें। फरिश्ता बताती हैं कि वो रोज अपनी बीमार मां को याद कर रोती थी। मां से उनकी मुलाकात 3 महीने बाद हो पाई।

2019 फरवरी में अमेरिका ने दोहा में तालिबानी अधिकारियों से शांति वार्ता शुरू की। तब अफगानियों को ये समझ आने लगा कि अब उनका मुल्क तालिबान के हाथ लगेगा। तभी फरिश्ता अपनी मां, दो बहनों और 13 साल के एक भाई को लेकर भारत आ गईं। वो अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करती थीं, पर भारत में उनके कोई अधिकार नहीं हैं।

वो कहती हैं- मैं भारत की बुराई नहीं करना चाहती हूं, पर ये जरूर कहूंगी कि यहां आकर मुझे आजादी मिली तो हक छिन गए। मैं मेहनत करने के लिए तैयार हूं, लेकिन आधार कार्ड नहीं होने से नौकरी नहीं मिलती है। नौकरी मिलती है तो भी तनख्वाह केवल 5 हजार मिलती है। कुछ समय पहले दिल्ली में हुए एक हादसे में मेरी बहन गुजर गई। मेरी दूसरी बहन डिप्रेशन में है।

मां को कैंसर हो गया है। सारे कागजात नहीं होने के कारण उनका ठीक से इलाज नहीं करवा पा रही हूं। मुझ पर छोटे भाई की भी जिम्मेदारी है। UNHRC भी हमारी कोई खास मदद नहीं करता है। हम बस एक-दूसरे के भरोसे जीते हैं।