सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : पुलिस की तेजी पर सवाल नहीं, हर नागरिक को ऐसी ही जांच चाहिए

भोपाल में ट्रैफिक एसीपी के घर हुई चोरी के मामले में पुलिस ने जिस तेजी और तकनीकी दक्षता के साथ कार्रवाई की, वह निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। घटना के बाद पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीमों ने आसपास के रास्तों से लेकर सोनकच्छ और देवास तक करीब 1,500 सीसीटीवी फुटेज खंगाले। तकनीकी साक्ष्यों और अन्य सुरागों के आधार पर पुलिस राजस्थान तक पहुंची और चार आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार चोरी का सामान, वाहन और अन्य सामग्री भी बरामद की गई।

लेकिन इस सफलता के साथ एक स्वाभाविक सवाल भी सामने आता है, जो शायद किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि आम नागरिक का सवाल है। यदि पुलिस किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के घर हुई चोरी के मामले में हजारों कैमरों की फुटेज खंगाल सकती है, अंतरराज्यीय स्तर पर टीम भेज सकती है और कुछ ही दिनों में आरोपियों तक पहुंच सकती है, तो आम नागरिकों की शिकायतों में ऐसी ही तत्परता क्यों दिखाई नहीं देती? सवाल यह नहीं है कि एसीपी के मामले में पुलिस ने इतनी तेजी क्यों दिखाई। सवाल यह है कि आम आदमी के मामले में भी पुलिस इसी स्तर की गंभीरता कब और कैसे सुनिश्चित करेगी।

हर चोरी में 1,500 सीसीटीवी खंगालना संभव हो, यह जरूरी नहीं। हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं, सुराग अलग होते हैं और जांच की कठिनाई भी अलग हो सकती है। इसलिए केवल गिरफ्तारी की समयसीमा के आधार पर पुलिस की हर जांच की तुलना करना उचित नहीं होगा। लेकिन नागरिकों की अपेक्षा इतनी जरूर है कि शिकायत दर्ज होने के बाद जांच में दिखाई देने वाली सक्रियता मामले की हैसियत देखकर नहीं, अपराध की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय हो।

पुलिस की असली विश्वसनीयता तब बनती है जब एक साधारण नागरिक भी यह महसूस करे कि उसकी शिकायत को उसी गंभीरता से लिया जा रहा है, जिस गंभीरता से किसी प्रभावशाली व्यक्ति की शिकायत को लिया जाता है। कानून की नजर में पीड़ित की सामाजिक हैसियत, पद या पहचान जांच की प्राथमिकता का आधार नहीं होनी चाहिए। किसी गरीब परिवार की चोरी हुई मोटरसाइकिल हो, दुकान में सेंधमारी हो, घर से नकदी और जेवर चोरी हुए हों या किसी बुजुर्ग के साथ ठगी हुई हो—हर मामले में पीड़ित को यह भरोसा होना चाहिए कि पुलिस उपलब्ध तकनीकी संसाधनों का पूरा उपयोग करेगी।

आज शहर में सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है। सरकारी प्रतिष्ठानों, बाजारों, कॉलोनियों, पेट्रोल पंपों, सड़कों और निजी संस्थानों में कैमरे लगे हैं। इनके बीच समन्वित जांच की क्षमता पुलिस के पास अपराधों को सुलझाने का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। एसीपी के मामले में 1,500 फुटेज की जांच यह दिखाती है कि जब जांच टीम एक स्पष्ट दिशा में काम करती है तो तकनीक कितनी प्रभावी हो सकती है। यही क्षमता आम नागरिकों के मामलों में भी व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।

मगर केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। जांच अधिकारियों पर काम का बोझ, लंबित मामलों की संख्या, फोरेंसिक संसाधनों की उपलब्धता, साइबर जांच की क्षमता और विभिन्न थानों के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी थाने में जांच अधिकारियों के पास दर्जनों मामलों की जिम्मेदारी है, तो हर मामले में अपेक्षित गति बनाए रखना कठिन हो सकता है। इसलिए पुलिस सुधार का सवाल केवल अधिकारियों से जवाब मांगने तक सीमित नहीं होना चाहिए; पर्याप्त मानव संसाधन और आधुनिक जांच सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी।

फिर भी महीनों तक लंबित मामलों पर पुलिस को जवाब देना चाहिए। किसी जांच में देरी हो रही है तो पीड़ित को कम से कम यह जानकारी मिलनी चाहिए कि जांच किस स्तर पर है, किन साक्ष्यों की जांच की जा रही है और आगे क्या प्रक्रिया है। हर मामले में आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी संभव नहीं होती, लेकिन जांच की प्रगति पूरी तरह अस्पष्ट रहना भी उचित नहीं है।

पुलिस के लिए यह भी जरूरी है कि मामलों की प्राथमिकता तय करने की व्यवस्था पारदर्शी हो। गंभीर अपराध, संगठित अपराध, महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराध, बुजुर्गों को निशाना बनाने वाली ठगी और बार-बार होने वाली चोरी की घटनाओं पर विशेष निगरानी होनी चाहिए। यदि किसी इलाके में लगातार चोरी हो रही है तो उसे अलग-अलग एफआईआर मानकर छोड़ने के बजाय पैटर्न की पहचान कर संयुक्त जांच की जा सकती है। एसीपी के घर की घटना में भी पुलिस ने आरोपियों के पूर्व अपराधों से संभावित संबंधों की जांच की है।

इस मामले की सफलता को पुलिस की उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन इसे नागरिकों के लिए एक मानक बनाने की जरूरत भी है। पुलिस को यह बताने की जरूरत नहीं कि उसने अधिकारी के मामले में ज्यादा तेजी क्यों दिखाई; बल्कि उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आम नागरिक के मामले में भी जांच की गुणवत्ता और गंभीरता कम न हो।

आखिरकार पुलिस की प्रतिष्ठा केवल बड़े मामलों के खुलासे से नहीं बनती। वह उस छोटे से थाने में बनती है, जहां कोई सामान्य नागरिक चोरी, ठगी या अपराध की शिकायत लेकर पहुंचता है और उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसकी समस्या भी राज्य के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है। एसीपी के घर की चोरी का खुलासा पुलिस की क्षमता का प्रमाण है। अब इसी क्षमता को व्यवस्था का सामान्य हिस्सा बनाना अगली चुनौती है।

जनता को पुलिस से चमत्कार नहीं चाहिए। उसे चाहिए कि शिकायत दर्ज हो, जांच शुरू हो, उपलब्ध तकनीक का इस्तेमाल हो, प्रगति की जानकारी मिले और दोषी तक पहुंचने के लिए ईमानदार प्रयास दिखाई दे। यदि पुलिस यह भरोसा कायम कर पाती है कि कार्रवाई व्यक्ति देखकर नहीं, अपराध देखकर होगी, तो कानून-व्यवस्था में जनता का विश्वास कहीं अधिक मजबूत होगा। यही किसी भी प्रभावी पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।


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