सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : 'ख्याल संग्रह की दोनों पुस्तकें शास्त्रीय संगीत के सबसे पुराने ग्वालियर घराने की प्राचीन पारंपरिक बंदिशों के नायाब संग्रह हैं। यह भारतीय ज्ञान परंपरा का उज्ज्वल प्रतीक भी है। इन दोनों संग्रहों में केवल शास्त्रीय संगीत की चर्चा नहीं है; यहाँ लोक और शास्त्र का जीवंत संबंध भी उद्घाटित होता है। लोक में प्रचलित ख्याल, नौटंकी, माच, चंग, बैठक और अन्य विविध रूपों का उल्लेख यह संकेत देता है कि भारतीय संस्कृति में शास्त्र और लोक परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करने वाले आयाम हैं। शास्त्र लोक से ऊर्जा ग्रहण करता है और लोक शास्त्र से स्थायित्व। इसी परस्पर संवाद ने भारतीय संगीत को कालजयी बनाया है। उक्त उद्गार संतोष चौबे, कुलाधिपति रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय एवं निदेशक, विश्व रंग ने पं. कृष्ण नारायण तैलंग द्वारा रचित ग्वालियर घराने की प्राचीन पारंपरिक बंदिशें "ख्याल संग्रह" की दो पुस्तकों के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उल्लेखनीय हैं कि बहुत ही आकर्षक कलेवर के साथ इन दोनों पुस्तकों का प्रकाशन आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा किया गया। है।

लोकार्पण कार्यक्रम विश्व रंग के अंतर्गत पूर्व रंग में विश्व रंग फाउंडेशन, वनमाली सृजन पीठ, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, आईसेक्ट पब्लिकेशन एवं स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा वनमाली सभागार, एसजीएसयू में संयुक्त रूप से आयोजित किया गया।

सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा माँ शारदा की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर एवं दीप प्रज्ज्वलन कर लोकार्पण समारोह का विधिवत शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत अंग वस्त्र, प्रतीक चिन्ह और पौधे भेंट कर किया गया।

पं. कृष्ण नारायण तैलंग की ख्याल संग्रह पुस्तकें लोकार्पित हुई

इसके पश्चात अतिथियों द्वारा पं. कृष्ण नारायण तैलंग द्वारा रचित ग्वालियर घराने की प्राचीन पारंपरिक बंदिशें "ख्याल संग्रह" भाग प्रथम एवं भाग द्वितीय का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण समारोह में स्वागत उद्बोधन सुश्री ज्योति रघुवंशी, प्रबंधक, आईसेक्ट पब्लिकेशन, राष्ट्रीय संयोजक, वनमाली सृजन पीठ द्वारा दिया गया। कार्यक्रम का बहुत ही सुंदर संचालन विनय उपाध्याय, निदेशक, टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र तथा संपादक, रंग संवाद पत्रिका द्वारा किया गया। इस अवसर पर पं. कृष्ण नारायण तैंलग के सुपुत्र अरुण तैलंग, भानु तैलंग एवं दिनकर तैलंग ने बहुत ही आत्मीयता के संग अपने पिता के शास्त्रीय संगीत साधना और ग्वालियर घराने की प्राचीन पारंपरिक बंदिशों के संग्रह से जुड़ी स्मृतियों को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया। वरिष्ठ संगीतज्ञ उल्लास तैलंग ने भी इस अवसर पर अपने गुरु पं. कृष्ण नारायण तैलंग से शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण करते समय के अनुभवों को साझा किया।

इस अवसर पर पं. कृष्ण नारायण तैंलग के सुपुत्र अरुण तैलंग, भानु तैलंग एवं श्री दिनकर तैलंग ने अपने पिता के द्वारा हस्तलिखित ग्वालियर घराने की प्राचीन पारंपरिक बंदिशों की पाण्डुलिपियाँ संतोष चौबे को भेंट की गई। उल्लेखनीय है कि यह पाण्डुलिपियाँ रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में संस्कृत प्राच्य भाषा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र के पाण्डुलिपि संग्रहालय में संग्रहित की जाएगी। लोकार्पण समारोह में मुंबई से विशेष तौर पर आये सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक भरत तैलंग ने ख्याल गायकी को अपने सुरीले स्वरों में प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राग में बड़ा ख्याल – साँझ भई, ताल एकताल छोटा ख्याल – देहरी धूमर पियरी काजर, ताल आड़ा चौताल, तत्पश्चात राग रागेश्री – ब्रिजराज की देख शोभा ताल झपताल, छोटा ख्याल सास ननदिया जागे मोरी और तराना की अविस्मरणीय प्रस्तुतियों से सभी को सराबोर कर दिया। उनके साथ हारमोनियम पर सुयश राजपूत और तबले पर मुकेश रासगाया ने बहुत ही सुंदर संगत से इसे और अधिक यादगार बना दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में संगीत विशेषज्ञों, संगीत प्रेमियों, रचनाकारों, आर.एन.टी.यू. एवं एस.जी.एस.यू. के विभागाध्यक्षों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों ने अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई।


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