सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय ने वनवासी कल्याण परिषद, भोपाल महानगर के साथ मिलकर एक दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन किया, जिसका विषय था “जनजातीय नायकों का ऐतिहासिक सामाजिक और आध्यात्मिक योगदान।” इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को जनजातीय समाज के ऐतिहासिक योगदान से अवगत कराना था।


कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं वक्ता, वनवासी कल्याण परिषद के प्रांत महामंत्री योगीराज परते ने अपने संबोधन में कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियों का आयोजन करने का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को उस पक्ष से परिचित कराना है, जो उन्हें अक्सर नहीं बताया जाता। उन्होंने बताया कि भारत में 300 से अधिक जनजातियाँ हैं, और प्रत्येक जनजाति की अपनी विशिष्ट परंपराएँ और संस्कृति है। जनजातीय समाज मुख्य रूप से ऐसे क्षेत्रों में निवास करता है, जहाँ घने जंगल और खनिज प्रचुर मात्रा में होते हैं। योगीराज परते ने यह भी कहा कि भारत पर जब भी बाहरी आक्रमण हुआ, तब जनजातीय समाज ने उनका विरोध किया और उनके संघर्षों का इतिहास सम्मान के योग्य है।
उन्होंने खासकर रानी दुर्गावती का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने महाकौशल क्षेत्र में 12 वर्ष तक शासन किया और अकबर के साम्राज्य के सामने संघर्ष किया। इसके अलावा, उन्होंने राणा प्रताप और भीलों के साथ उनके संबंधों को भी बताया, साथ ही झारखंड के तिलका मांझी का भी उल्लेख किया जिन्होंने संथाल जनजाति को संगठित कर अंग्रेजों से संघर्ष किया और वीरगति को प्राप्त हुए।
योगीराज परते ने यह भी कहा कि जनजातीय समाज ने हमेशा मानव मूल्यों को संरक्षित किया है और यह समाज प्रकृति के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। उनका कहना था कि जनजातीय समाज का आदर्श “अतिथि देवो भव:” को सही अर्थों में लागू करता है, क्योंकि ये समाज वृक्षों, नदियों और पहाड़ों को देवता के रूप में पूजता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर संजय तिवारी ने कहा कि जनजातीय समाज ने हमेशा जल, जंगल, और जमीन के लिए संघर्ष किया है और वे इस देश के असली मूल निवासी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस समाज में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है और यह समाज प्रकृति के साथ सह अस्तित्व में रहता है।
प्रोफेसर एल.पी. झरिया, विश्वविद्यालय के निदेशक ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जनजातीय समाज का इतिहास अत्यंत समृद्ध है और यह समाज आत्मनिर्भर और नैतिक रूप से उच्च रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय में जनजाति शोधपीठ की स्थापना की बात भी साझा की, ताकि जनजातीय समाज पर और अधिक शोध किया जा सके।
इस कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर रतन सूर्यवंशी ने किया और इस अवसर पर वनवासी कल्याण परिषद द्वारा “जनजातीय गौरव” नामक पुस्तक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर संजय तिवारी को भेंट की गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, विश्वविद्यालय के कर्मचारी और शिक्षक उपस्थित थे।

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