सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मध्यप्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय, भोपाल एवं अनुसूचित जनजातीय शोध एवं ज्ञान केंद्र नई दिल्ली के मध्य हुए एमओयू के अनुक्रम में अनुसूचित जनजातीय बाहुल्य जिले झाबुआ में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया है, जिसमें अनुसूचित जनजातीय विकास के लिए पाठ्यक्रमों के निर्माण पर विमर्श किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि पाठ्यक्रम का निर्माण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि जनजातीय समाज के समग्र विकास में सहयोगी बन सके। यह भी तय किया गया कि पाठ्यक्रम जनजातीय समाज की अस्मिता, अस्तित्व एवं विकास पर केंद्रित हों। इस अवसर पर प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति के अध्यक्ष प्रो. रविंद्र कान्हेरे ने कहा कि जनजातीय विकास और अध्ययन पर आधारित ऐसे पाठ्यक्रमों का विकास किया जाए जो उनकी संस्कृति भाषा न्याय पद्धति और जीवन पद्धतियों का अध्ययन कर सकें। साथ ही पाठ्यक्रम ऐसे बनें जो उनकी स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करें। हर्ष चौहान, राष्ट्रीय जनजातिय आयोग के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि जनजातीय समाज तक शिक्षा पहुंचाने के लिए मुक्त विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्वविद्यालय जनजातीय विकास पर आधारित ऐसे पाठ्यक्रमों का निर्माण करें, जिससे जनजातीय समाज संस्कृति और साहित्य पर व्यापक अध्ययन किया जा सके। पाठ्यक्रमों को जनजातीय समाज के व्यवसायों से भी समृद्ध किया जाना चाहिए

विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मिलिंद दांडेकर ने कहा कि मुक्त विश्वविद्यालयीन शिक्षा का उद्देश्य उन लोगों तक शिक्षा को पहुंचाना है, जहां तक शिक्षा की पहुंच नहीं है। भोज विश्वविद्यालय ऐसे पाठ्यक्रमों का निर्माण कर रहा है, जो जनजातीय समाज के विकास में सहायक बनेंगे। प्रो. विवेक कुमार, आईआईटी नई दिल्ली ने कहा कि जनजातीय अस्मिता अस्तित्व और विकास को समझना आवश्यक है। जनजातिय शिक्षा ऐसी होना चाहिए जो जनजातीय समाज के लिए उपयोगी हो। जनजातीय समाज का परंपरागत ज्ञान कला और चिकित्सा इतनी प्रभावी है कि उस पर अध्ययन कर संपूर्ण समाज के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। प्रो. मधुकर पाड़वी, कुलगुरु बिरसा मुंडा जनजातीय विश्वविद्यालय राजपिपला गुजरात एवं कार्यकारी अध्यक्ष भारतीय सामाजिक विज्ञान एवं शोध परिषद ने कहा कि रिसर्च मेथाडोलॉजी में शिक्षा की विदेशी संकल्पना की बजाय भारतीय संकल्पना को अपनाना होगा। जनजातीय परंपराओं और कलाओं को भी प्रकाशित करना आवश्यक है, जिससे जनजातीय समाज का समग्र विकास संभव हो सके। प्रोफेसर व्ही. के. सारस्वत, कुलपति पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़, बिलासपुर ने कहा कि जनजातिय अध्ययन पर वैल्यू एडिड पाठ्यक्रमों को लागू कर जन सामान्य में जनजाति अध्ययन को सामने लाया जा सकता है। कार्यशाला में भारत में जनजातीय समाज के विकास संबंधी पाठ्यक्रम का निर्माण किया गया तथा यह विचार किया गया कि इस पाठ्यक्रम को अन्य परंपरागत पाठ्यक्रमों के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार वैल्यू एडिड पाठ्यक्रम के रूप में चलाया जा सकता है, साथ ही इन पाठ्यक्रमों को स्वयं पोर्टल के माध्यम से भी संचालित किया जाना चाहिए, ताकि इसकी पहुंच सभी तक हो सके। इसके अतिरिक्त पाठ्यक्रमों के निर्माण के संबंध में वैभव सुरंगे, अभिनव प्रकाश, दीपमाला रावत, नेहा गुप्ता, पियासी दत्ता, विमल भाई गुजरात, राजीव शर्मा, लक्ष्मण सिंह मरकाम धर्मराज कटियारे, डॉ. गजेंद्र आर्य ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन प्रो. रतन सूर्यवंशी, निदेशक एवं संयोजक मध्यप्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा किया गया।
#भोजविश्वविद्यालय #जनजातीयविकास #कार्यशाला #उच्चशिक्षा #समावेशीविकास #शोध