सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भोपाल / नालंदा । भारतीय भाषाओं, साहित्य, कला और संस्कृति के वैश्विक संवाद को समर्पित ‘विश्वरंग नालंदा–2026’ का समापन छह दिवसीय साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों, वैचारिक विमर्श और संगीत प्रस्तुतियों के साथ हुआ।पटना और नालंदा में आयोजित इस महोत्सव में भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषाई विविधता, सांस्कृतिक अंतर्संबंधों, अनुवाद, लोक परंपराओं तथा दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों पर व्यापक चर्चा हुई। नालंदा विश्वविद्यालय के विशाल सभागार ‘विश्व मित्रालय’ में आयोजित उद्घाटन समारोह में विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और संस्कृति चिंतकों ने भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।

ऐतिहासिक महत्व का आयोजन है विश्वरंग नालंदा : मुकुल कानिटकर उद्घाटन समारोह में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सचिन चतुर्वेदी, विश्वरंग के निदेशक एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे, मुख्य अतिथि एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव के. श्रीनिवास (आईएएस), मुख्य वक्ता वरिष्ठ विचारक मुकुल कानिटकर तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के उप-महानिदेशक राजेश रंजन सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि विश्वरंग का नालंदा में आयोजन होना और विश्वविद्यालय को इसकी मेजबानी का अवसर मिलना गौरव की बात है। उन्होंने इसे ज्ञान और संस्कृति की ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण अवसर बताया।

विश्वरंग के निदेशक संतोष चौबे ने कहा कि संस्कृतियों की भावधारा की तलाश विश्वरंग का प्रमुख उद्देश्य रहा है। भारत की संस्कृति उसकी भाषाओं में दिखाई देती है और भारतीय भाषाएं हमारी सांस्कृतिक विरासत की संवाहक हैं। बोलियां भाषा को रस, जीवंतता और जनसरोकार प्रदान करती हैं, इसलिए उनसे जुड़े समाजों और समुदायों का सम्मान भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वरंग महात्मा गांधी के संतुलित विकास के विचार और रवीन्द्रनाथ टैगोर के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। अब तक 70 से अधिक देशों के प्रवासी भारतीय रचनाकार और विदेशी हिंदीसेवी इससे जुड़ चुके हैं। यह मंच हिंदी, भारतीय भाषाओं, बोलियों, कला, साहित्य और संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने का कार्य कर रहा है। वरिष्ठ विचारक एवं शिक्षाविद् मुकुल कानिटकर ने कहा कि सब कुछ देने के भाव का नाम नालंदा है। नालंदा के विश्व मित्रालय सभागार में विश्वरंग का आयोजन अपने आप में ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव केवल साहित्यिक समागम नहीं, बल्कि एक सुखी, शांतिपूर्ण और ज्ञानयुक्त विश्व के निर्माण का संकल्प है। वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और समावेशिता के भाव को आगे बढ़ाना हमारा नैतिक दायित्व है।

मुख्य अतिथि के. श्रीनिवास ने कहा कि नालंदा में विश्वरंग का आयोजन और पूर्वोत्तर भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के संदर्भ में भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा कलाओं पर संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। नालंदा सदियों से विभिन्न संस्कृतियों के मिलन और ज्ञान के आदान-प्रदान का केंद्र रहा है। विश्वरंग इसी परंपरा को नए विस्तार के साथ आगे बढ़ा रहा है। आईसीसीआर के उप-महानिदेशक राजेश रंजन ने भी नालंदा में विश्वरंग के आयोजन को अविस्मरणीय बताते हुए ज्ञान को सीमाओं से परे सकारात्मक संवाद के माध्यम से साझा करने की आवश्यकता रेखांकित की। उद्घाटन अवसर पर विश्वरंग के सात संस्करणों और नालंदा विश्वविद्यालय की यात्रा पर केंद्रित लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इन फिल्मों के माध्यम से भारतीय कला परंपराओं को व्यापक मंच देने और नालंदा की वैश्विक ज्ञान परंपरा को रेखांकित किया गया।

भारतीय भाषाओं और दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक संबंधों पर मंथन ‘दक्षिण एशियाई भाषाओं का सांस्कृतिक अंतर्संबंध और भारतीय भाषाएं’ विषय पर आयोजित सत्र में वक्ताओं ने कहा कि भारत और एशिया के विभिन्न देशों के बीच भाषाओं, साहित्य और संस्कृति का आदान-प्रदान प्राचीन काल से होता रहा है। सत्र की अध्यक्षता नालंदा विश्वविद्यालय के अमरजीत लोचन ने की। सोमा बंदोपाध्याय ने तुलनात्मक साहित्य को विभिन्न भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए व्यापक शोध की आवश्यकता पर बल दिया। डी. वेंकट राव ने भारतीय भाषाओं के समावेशी स्वरूप और उन पर बढ़ते यूरोपीय भाषाओं के वर्चस्व को एक बड़ी चुनौती बताया। सिंगापुर से आईं रचनाकार एवं अनुवादक नीतू बजाज ने प्रवास, शिक्षा और व्यापार के माध्यम से भारतीय भाषाओं के दक्षिण एशियाई देशों तक पहुंचने की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि एशियाई देशों की कविताओं में भावनात्मक समानताएं दिखाई देती हैं, लेकिन यूरोपीय साहित्य की तुलना में एशियाई साहित्य का अध्ययन और परिचय अपेक्षाकृत कम है। उन्होंने एशियाई साहित्य की विशिष्ट संवेदनाओं और साझा ऐतिहासिक अनुभवों को समझने की आवश्यकता बताई।

वरिष्ठ रचनाकार जानकी प्रसाद शर्मा ने संस्कृत, हिंदी, फारसी और उर्दू की साहित्यिक परंपराओं के उदाहरण देते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा की बहुलतावादी प्रकृति को रेखांकित किया। वनमाली सृजन पीठ की राष्ट्रीय संयोजक एवं आईसेक्ट पब्लिकेशन की प्रबंधक ज्योति रघुवंशी ने भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने और अनुवाद को सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। अनुवाद को वैश्विक संवाद और ज्ञान के विस्तार का माध्यम बनाने पर जोर ‘अनुवाद : भाषा समन्वय, परंपरा और विकास’ विषयक सत्र में विशेषज्ञों ने साहित्य के साथ-साथ तकनीकी शिक्षा, कानून, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में अनुवाद की बढ़ती आवश्यकता पर चर्चा की।

सत्र की अध्यक्षता ए. अरविंदाक्षन ने की। उन्होंने विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों और अनुवादकों के बीच सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि भूषण भावे ने कहा कि देशों के बीच बढ़ती आवाजाही के कारण अनुवाद की आवश्यकता तेजी से बढ़ी है। मशीनी अनुवाद एक बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है और युवाओं के लिए नए अवसर पैदा कर रहा है, लेकिन इसके उपयोग में रचनात्मकता और भाषा की मौलिकता से जुड़ी चुनौतियों को भी समझना होगा। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के कुलसचिव एवं वरिष्ठ कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि विभिन्न संस्कृतियों के निर्माण और उनके बीच संवाद स्थापित करने में अनुवादकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भाषा और संस्कृति का गहरा संबंध है तथा अनुवाद किसी रचना का पुनर्सृजन है। उन्होंने ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों की सामग्री के अनुवाद पर भी ध्यान देने की आवश्यकता बताई।

विश्वरंग फाउंडेशन की निदेशक एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय की प्रति-कुलाधिपति अदिति चतुर्वेदी वत्स ने कहा कि अनुवाद को केवल साहित्य और पुस्तक प्रकाशन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। वैश्विक स्तर पर अनुवाद उद्योग में व्यापक संभावनाएं हैं। भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को प्रोत्साहित करने के साथ ही ई-बुक और ऑडियोबुक जैसे माध्यमों से भी सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मशीनी अनुवाद के बढ़ते उपयोग के बावजूद भाषा और विषय के विशेषज्ञों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी। nअनुवाद अध्ययन केंद्र, इग्नू, दिल्ली की ज्योति चावला ने अनुवाद को केवल भाषाई गतिविधि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ी प्रक्रिया बताया। टैगोर अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र के निदेश जवाहर कर्नावट ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद की मांग बढ़ रही है और यह वैश्विक संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है।

पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्थिक-सांस्कृतिक संबंधों पर चर्चा ‘पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्वी देशों की आर्थिक-सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सचिन चतुर्वेदी ने की। सत्र में एस.के. मोहंती, सुधांशु कुमार, पी.के. विश्वास, मेरी बाल, इमान कल्याण लाहिड़ी तथा किशोर धावला ने क्षेत्रीय संबंधों के विभिन्न आयामों पर विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत भौगोलिक रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश-द्वार होने के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान की महत्वपूर्ण कड़ी भी है। साझा ऐतिहासिक स्मृतियों, लोक परंपराओं, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समानताओं को आर्थिक सहयोग से जोड़कर क्षेत्रीय विकास को नई दिशा दी जा सकती है। इस दौरान समावेशी विकास, व्यापारिक सहयोग, पर्यटन और जन-जन के बीच संपर्क मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। नालंदा की ज्ञान परंपरा से भविष्य के विश्वविद्यालयों की परिकल्पना ‘नालंदा की ज्ञान परंपरा और भविष्य के विश्वविद्यालय’ विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलाधिपति सिद्धार्थ चतुर्वेदी ने की। उन्होंने कहा कि नालंदा की ज्ञान परंपरा को आधार बनाकर भविष्य के विश्वविद्यालयों की परिकल्पना करना नई ऊर्जा प्रदान करता है। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में नालंदा विश्वविद्यालय के नेट-जीरो कार्बन परिसर से प्रेरणा लेकर देश के 1,400 से अधिक विश्वविद्यालय अपने परिसरों को नेट-जीरो मॉडल पर विकसित करें, तो कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप बहुविषयक दृष्टिकोण, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और आलोचनात्मक चिंतन को भविष्य के विश्वविद्यालयों के प्रमुख आधार बनाने की आवश्यकता बताई।

स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति विजय सिंह ने उद्योग-एकीकृत शिक्षा की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उद्योगों के साथ साझेदारी, एंकर पार्टनर्स और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव, अप्रेंटिसशिप और इंटर्नशिप के अवसर दिए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय परिसर में ही उद्योगों जैसा कार्य वातावरण उपलब्ध कराने से विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान व्यावहारिक कौशल विकसित कर रोजगार के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो सकते हैं। सत्र में राजेश्वर कुमार, पल्लव तिवारी, किशोर कुमार तंगवेलु और अभिषेक पंडित ने भी विचार व्यक्त किए।

पटना में लोक संस्कृति और रंगमंच की प्रस्तुतियों ने बढ़ाई महोत्सव की गरिमा विश्वरंग नालंदा के अंतर्गत पटना में आयोजित कार्यक्रमों में पटना संग्रहालय और प्रेमचंद रंगशाला प्रमुख केंद्र रहे। पटना संग्रहालय में भारतीय संस्कृति, दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई सांस्कृतिक चेतना, कला और साहित्य के विभिन्न पक्षों पर विमर्श हुआ। प्रख्यात लेखक एवं पूर्व राजनयिक पवन के. वर्मा सहित साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृति चिंतकों ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत तथा एशियाई समाजों के बीच संवाद की संभावनाओं पर विचार रखे। प्रेमचंद रंगशाला में लोकगीतों और लोकनृत्यों की प्रस्तुतियों के साथ संतोष चौबे द्वारा रचित ‘उनके हिस्से का प्रेम’ और ‘लेखक बनाने वाले’ नाटकों का मंचन किया गया। इन प्रस्तुतियों ने भारतीय लोकजीवन, सामाजिक संवेदनाओं और रंगमंच की समृद्ध परंपरा को अभिव्यक्त किया। श्रीकांत आचार्य की रवीन्द्र संगीत प्रस्तुति ने बांधा समां महोत्सव की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में सुप्रसिद्ध रवीन्द्र संगीत गायक श्रीकांत आचार्य और उनके साथियों की प्रस्तुति विशेष आकर्षण रही। रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं पर आधारित गीतों में प्रेम, विरह, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। गायन और वाद्ययंत्रों के सुमधुर संयोजन ने सभागार को आत्मीय और भावपूर्ण वातावरण से भर दिया। प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं ने कलाकारों का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। विश्वरंग नालंदा–2026 ने यह संदेश दिया कि भारतीय भाषाएं और संस्कृति केवल देश की विरासत नहीं, बल्कि एशिया के विभिन्न समाजों के बीच संवाद, सहयोग और साझा सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार हैं। नालंदा की ऐतिहासिक ज्ञान परंपरा की भूमि पर आयोजित यह महोत्सव भारतीय भाषाओं, साहित्य, कला और संस्कृति को दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया।

विश्वरंग–2026 का आयोजन सी. वी. रमन विश्वविद्यालय, वैशाली, विश्वरंग फाउंडेशन तथा नालंदा विश्वविद्यालय, नालंदा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इस अवसर पर सी. वी. रमन विश्वविद्यालय, वैशाली के कुलसचिव ब्रिजेश सिंह ने कहा कि नालंदा और वैशाली भारतीय इतिहास तथा ज्ञान परंपरा की दो महत्वपूर्ण भूमि हैं। विश्वरंग नालंदा के माध्यम से दोनों के बीच स्थापित अकादमिक और सांस्कृतिक संवाद भविष्य में नई साझेदारियों का आधार बनेगा और भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति के व्यापक प्रसार को नई दिशा देगा।


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