सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : विश्वरंग 2026 में भारतीय संस्कृति और साहित्य की वैश्विक चेतना पर विमर्श
हमारे शास्त्र अद्वैत सिद्धांत की बात करते हैं। उनमें एकात्मक की चर्चा मिलती है। जिस प्रकार सूरज में एक प्रकार की संपूर्णता होती है उसी तरह अद्वैत भी एकात्म होता है। इस संसार में बहुत से भेद दिखाई देते हैं और आमतौर पर हम इनमें ही जीते हैं। किंतु हमारे शास्त्र कहते हैं कि सब कुछ एक है। किसी भी तरह का द्वंद अंतिम सत्य नहीं होता है। ये बातें आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की स्वामिनी सदविद्यानंद सरस्वती नें कहीं। वे एमसीयू में आयोजित तीन दिवसीय टेडेक्स टॉक के प्रथम सत्र में विद्यार्थियों को संबोधित कर रही थीं। विचारों से बदलती दुनिया की थीम पर आयोजित इस कार्यक्रम में वे अद्वैत जीवन दृष्टि पर बोल रहीं थीं। उन्होंने कहा कि वेदों का सार यही है। वेद ज्ञान का शरीर हैं। ये ग्रंथ ज्ञान का केंद्र हैं। वेद शब्द की उत्पत्ति विद शब्द हुई है। इसका आशय ज्ञान से है। ज्ञान सार्वभौमिक और वस्तुनिष्ठ होता है। इस तरह ज्ञान भी एकात्म है। और यही एकात्म वास्तविकता होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह का भेद भय पैदा करता है। भय से अशांति और अनिश्चिता आती हैं। और ऐसी परिस्थिति में सुख का अभाव होता है। एकात्म का भाव भय को दूर करता है। उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि तीन दशकों से अधिक समय की अपनी यात्रा में विश्वविद्यालय आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर के टेडेक्स टॉक का आयोजन कर हर्ष का अनुभव कर रहा है। उन्होंने कहा कि वैदिक परंपरा को आचार्य शंकर ने एक विशिष्ट रूप में हमारे सामने रखा। यही परंपरा स्वामी विवेकानंद तक आती है। धरती पर ओमकारेश्वर ही एक ऐसी जगह है जहां 11-12 वर्ष के बालक शंकर ने ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे इस आयोजन के व्याख्यानों को ध्यान से सुनें और उनके महत्वपूर्ण बिंदुओं को अपने जीवन में उतारें। इस कार्यक्रम में दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता, भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी, प्रख्यात लेखक और चिंतक मनोज श्रीवास्तव ने डिजिटल दौर मे बदलता भाषा का स्वरूप और युवा विषय पर बोलते हुए कहा कि भारतीय समाज की यात्रा अंर्तनेत्र से इंटरनेट तक की यात्रा है जिसमें माध्यम, संस्कृति आदि तमाम चीजें बदलीं हैं। इसके साथ ही सृष्टि या विश्व भी बदला है और उसे देखने की हमारी दृष्टि भी बदली है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में देखें तो श्रुति और स्मृति हमारी वास्तविक वाचिक परंपरा और संस्कृति के परिचायक हैं। श्रुति से जब लिपि का विकास हुआ तो लिपियों ने भाषा को व्याकरणिक स्वरूप दिया और एक प्रकार के अनुशासन में उसे बांध दिया। इसके बाद लेखन होने लगा तो भाषा साधना से साधन बन गई। प्रिंटिंग के आविष्कार के बाद भाषा लिखित से मुद्रित हो गई और डिजिटल युग में तमाम प्लेटफार्म के दौर में भाषा के साथ बहुत से परिवर्तन महसूस किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाषा एक परंपरा होती है जो उत्तराधिकार से हमें मिलती है। यह अपने साथ संस्कार लेकर आती है। आज मानव के भाषिक व्यवहार का पूरा संसार बदल गया है। भाषा में जो परिवर्तन हो रहे हैं वह सतही नहीं है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और कामता प्रसाद गुरु द्वारा हिंदी के मानकीकरण की चर्चा करते हुए श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि बहुत सारे शब्द प्रचलन से ही समाज में स्वीकृति पा सके हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल अभिव्यक्ति की अपनी भाषिक संस्कृति है। इसमें तात्कालिकता और अनौपचारिकता है। डिजिटल दौर में इमोजी भाषा के बतौर स्वीकृत हो रही है। संकेतों की वापसी हो रही है। भाषाओं का अपना एल्गोरिथम होता है। युवाओं में चीजों को लेकर सहजता होती है भाषिक शब्दों की क्षमता बड़ी है मैथिली राजस्थानी आदि क्षेत्रीय भाषाओं में बिजली कारण से भाषा की क्षमता बड़ी है भाषा के साथ प्रयोग उसकी जीवंत का परिचायक है आज का युवा भाषा का नायक है वह नहीं भाषण कर रहा है
तीसरे सत्र में मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश राजपूत ने एक स्क्रीन करोड़ों कहानियां विषय पर अपनी टेलिविजन पत्रकारिता की मार्मिक और प्रभावशाली संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा कि टीवी पत्रकारिता करते हुए हम हर दिन कई कहानियों से रू-ब-रू होते हैं। हर कहानी में एक दर्द, एक खुशी एक सवाल और एक समाधान होता है। उन्होंने दुष्यंत कुमार के घर टूटने से लेकर बुंदेलखंड की बिल्लोरानी, झाड़ी में मिली नवजात बच्ची से लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना की हकीकत वाली स्टोरीज को रोचक अंदाज में सुनाकर सभागार का दिल जीत लिया। ब्रजेश ने विद्युत शवदाहगृह की स्टोरी में धुंए में मां का प्रतिरूप देखने वाली बच्ची के अनुभव को शब्द दिए वहीं एक डूबते हुए शहर हरसूद, की कहानी सुनाकर कहा कि टीवी की दुनिया में इमोशन से हर चीज बिकती है। हमें सिखाया गया कि गले में हाथ डालकर इमोशंस निकालिए । टीवी पत्रकारिता सामाजिक सरोकार, संवेदना और सामाजिक सच्चाई को न सिर्फ देखना सिखाती है बल्कि उसको पर्दे पर दिखाने का कौशल भी सिखाती है। यहां आपका काम दिखता है लेकिन आपकी एक गलती शर्मसार भी कर सकती है तो एक अच्छा काम शाबासी भी दिला सकता है।
उन्होंने कहा कि कहानियां सबके पास होती हैं टीवी पत्रकारित में जरूरी है कि हम कहानी को कहने का सलीका सीखें।टीवी पत्रकारिता में जाने के लिए विद्यार्थियों से कहा कि टीवी रिर्पोटर की डायरी जरूर पढ़ें। ये डायरी बता सकती है कि एक स्टोरी के पीछे कितनी मेहनत और समर्पण जरूरी है। यह कार्यक्रम विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित किया गया। इसका समन्वय विभाग के प्रमुख पवित्र श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का आभार पवित्र श्रीवास्तव ने किया। सभी सत्रों का संचालन विभाग की जया सुरजानी ने किया। कार्यक्रम में जनसंचार तथा पत्रकारिता, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और पुस्तकालय विभागों के विद्यार्थी और शिक्षक उपस्थित थे।
Hashtags: #MadhyaPradeshState #Bhopal #2026 #एनएन #टवर #आईट #करत #उनम #तरह #वशवरग