सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क – आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस  /   आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल     /   उज्जैन   विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में “कथक नृत्य में गुरु-शिष्य परंपरा और संस्थागत शिक्षण पद्धति” विषय पर 17 सितंबर को शलाका दीर्घा में विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता, भोपाल की प्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. विजया शर्मा ने गुरु-शिष्य संबंध की गहराई और इसकी परंपरा पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य का चयन गुरु करता है, शिष्य नहीं, और यह संबंध शिक्षा के साथ जीवन की महत्वपूर्ण सीखों से भी जुड़ा होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरू अर्पण भारद्वाज ने की। मुख्य अतिथि अ भा संस्कार भारती के सह कोषाध्यक्ष श्रीपाद जोशी तथा अतिथियों में वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे, संस्कार भारती प्रांत अध्यक्ष संजय शर्मा और परीक्षा नियंत्रक डॉ. डी.डी. बेदिया शामिल थे।

डॉ. शर्मा ने अपने व्याख्यान में कथक के प्रमुख गुरु-शिष्य संबंधों का वर्णन किया और सही गुरु चयन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उनके गुरु ने उन्हें न केवल नृत्य की शिक्षा दी बल्कि जीवन की व्यावहारिक सीख भी दी। उनके मार्गदर्शन और आशीर्वाद से ही उन्होंने अपने जीवन में कई उपलब्धियां हासिल की हैं।  कुलगुरू अर्पण भारद्वाज ने कहा कि कला केवल एक विधा नहीं बल्कि साधना है। उन्होंने बताया कि विक्रम विश्वविद्यालय में जल्द ही संगीत का नया विभाग स्थापित किया जाएगा, जिससे युवा कलाकारों को सीखने और प्रदर्शन का अवसर मिलेगा। प्रो. भारद्वाज ने कला एवं गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर जोर देते हुए छात्रों को नृत्य और संगीत से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम का संचालन नृत्यांगना सुश्री पलक पटवर्धन ने किया और अंत में शशिधर नागर ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया। यह व्याख्यान विश्वविद्यालय में कला और नृत्य परंपरा को नई दिशा देने वाला कार्यक्रम रहा।

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