सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : वॉशिंगटन। रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ आर्थिक कार्रवाई को लेकर अमेरिका की रणनीति पर नया खुलासा हुआ है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन चाहता था कि यूरोपीय देश भी भारत और चीन पर अतिरिक्त शुल्क लगाएं, ताकि रूस की तेल से होने वाली कमाई पर दबाव बढ़ाया जा सके। हालांकि, यूरोपीय सहयोगियों ने इस प्रस्ताव में शामिल होने से इनकार कर दिया। ‘अमेरिका अकेले बोझ क्यों उठाए?’ अमेरिकी टेलीविजन चैनल एनबीसी के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में बातचीत के दौरान बेसेंट ने कहा कि वॉशिंगटन ने वसंत ऋतु में यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के लिए साथ आने को कहा था। उनके मुताबिक, यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। बेसेंट ने सवाल उठाया कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने का बोझ केवल अमेरिका ही क्यों उठाए। बेसेंट ने यूरोपीय देशों की ऊर्जा नीति की भी आलोचना की। उनका आरोप है कि यूरोप एक ओर यूक्रेन का समर्थन करता है, वहीं दूसरी ओर रूसी ऊर्जा की खरीद जारी रखकर रूस को राजस्व भी उपलब्ध कराता है। उन्होंने रूसी ऊर्जा आयात से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए यूरोपीय देशों की नीति पर सवाल उठाए।

ट्रंप प्रशासन ने 60 दिनों की दी मोहलत यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप प्रशासन ने रूस से जुड़े प्रतिबंधों और भारत सहित कुछ देशों पर प्रस्तावित शुल्कों के प्रभाव का आकलन करने के लिए 60 दिनों की अस्थायी छूट दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि प्रशासन वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इन कदमों के संभावित असर का मूल्यांकन करना चाहता है। रुबियो ने यह भी स्वीकार किया कि भारत जैसे देशों के लिए रूसी ऊर्जा पर निर्भरता को तुरंत समाप्त करना आसान नहीं है। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार बताया।

भारत के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से कच्चा तेल खरीदता है। रूस से तेल आयात की वजह से भारत पर अमेरिकी शुल्क और प्रतिबंधों का दबाव पहले भी चर्चा में रहा है। यदि कई पश्चिमी देश एक साथ अतिरिक्त शुल्क लगाने पर सहमत होते, तो भारतीय आयातकों और ऊर्जा बाजार पर इसका व्यापक असर पड़ सकता था।

फिलहाल, बेसेंट के बयान से स्पष्ट होता है कि रूस पर दबाव बनाने के तरीके को लेकर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच मतभेद हैं। हालांकि, यूरोप के इनकार का अर्थ यह नहीं है कि भारत और चीन पर भविष्य में किसी भी तरह की अमेरिकी कार्रवाई नहीं होगी। इस संबंध में आगे के फैसले वैश्विक ऊर्जा बाजार, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की नीतिगत समीक्षा पर निर्भर करेंगे।


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