सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल :सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को किसी भी स्थिति में “टेकओवर” नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल को तीन विकल्प प्रदान करते हैं—विधेयक को मंजूरी देना, उसे पुनर्विचार हेतु विधानसभा को लौटाना या राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखना। अदालत ने यह भी कहा कि वह इन संवैधानिक शक्तियों में न तो हस्तक्षेप कर सकती है और न ही उनकी जगह कोई निर्णय ले सकती है।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह अवश्य माना कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक किसी विधेयक को लंबित नहीं रख सकते। “लंबी, अस्पष्ट और अनिश्चित देरी” की स्थिति में न्यायालय सीमित हस्तक्षेप करते हुए केवल इतना निर्देश दे सकता है कि राज्यपाल एक “उचित समय” के भीतर निर्णय लें। लेकिन अदालत स्वयं कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं करेगी, क्योंकि ऐसा करना शक्तियों के पृथक्करण और संविधान की मूल संरचना के खिलाफ होगा।

इस फैसले को केंद्र-राज्य संबंधों और संवैधानिक संतुलन के लिहाज से बड़ा फैसला माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर संवैधानिक पद की अपनी भूमिका होती है, और न्यायालय इसे अधिग्रहित नहीं कर सकता।

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