सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : उत्तराखंड के नीचे 115 किमी का भ्रंश अवरुद्ध, बड़े भूकंप का खतरा

देहरादून। उत्तराखंड हिमालय के नीचे भूगर्भीय हलचल को लेकर एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के बीच स्थित मुख्य हिमालयी थ्रस्ट (मेन हिमालयन थ्रस्ट) का एक बड़ा हिस्सा मजबूती से अवरुद्ध है। इस कारण प्लेटों की लगातार गति से पैदा होने वाला तनाव धरती के भीतर जमा हो रहा है। अध्ययन में इस क्षेत्र में संचित ऊर्जा की तुलना लगभग 8.1 तीव्रता के एक बड़े भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा से की गई है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह भूकंप की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि भूगर्भीय तनाव के संचय का अनुमान है।

115 किलोमीटर चौड़ाई तक अवरुद्ध है भ्रंश अध्ययन का शीर्षक ‘एविडेंस ऑफ स्ट्रॉन्ग प्लेट कपलिंग इन द उत्तराखंड हिमालयाज’ है। इसे तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के दिब्यशक्ति पांडा और उनके सहयोगियों ने तैयार किया है। शोधकर्ताओं ने धरती की सतह पर स्थित ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) केंद्रों के आंकड़ों और जापान के एएलओएस-2 उपग्रह से प्राप्त रडार तस्वीरों का विश्लेषण किया। अध्ययन के मुताबिक, मुख्य हिमालयी थ्रस्ट लगभग 115 किलोमीटर की चौड़ाई तक अवरुद्ध है और इसका प्रभाव सतह से करीब 20 किलोमीटर की गहराई तक देखा गया है। यहां भारतीय प्लेट की गति का एक बड़ा हिस्सा भ्रंश के सहारे लगातार खिसकने के बजाय चट्टानों में तनाव के रूप में जमा हो रहा है।

हर साल 18 मिलीमीटर तनाव जमा होने का अनुमान शोधकर्ताओं ने प्लेटों की अपेक्षित गति और भ्रंश पर वास्तविक खिसकाव के बीच लगभग 18 मिलीमीटर प्रति वर्ष का अंतर पाया। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘स्लिप डेफिसिट’ कहा जाता है। उपग्रह रडार के आंकड़ों में जमीन के ऊर्ध्वाधर उठाव की अधिकतम दर लगभग 4 से 6 मिलीमीटर प्रति वर्ष भी दर्ज की गई। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि उत्तराखंड के नीचे हिमालयी भ्रंश में तनाव लगातार जमा हो रहा है। यदि भविष्य में भ्रंश का बड़ा हिस्सा एक साथ खिसकता है, तो शक्तिशाली भूकंप आ सकता है। हालांकि, ऐसा कब होगा और भूकंप की वास्तविक तीव्रता कितनी होगी, यह अध्ययन निर्धारित नहीं करता।

हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के बराबर ऊर्जा? अध्ययन में लगभग 300 किलोमीटर लंबे हिमालयी भ्रंश खंड में जमा हो रही ऊर्जा की दर की तुलना करीब 8.1 तीव्रता के एक बड़े भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा से की गई है। यह तुलना तनाव के दीर्घकालीन संचय को समझाने के लिए की गई है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर 100 साल में निश्चित रूप से 8.1 तीव्रता का भूकंप आएगा। न ही इससे अगले भूकंप की तारीख या समय का पता लगाया जा सकता है। हिमालयी क्षेत्र में पहले भी आ चुके हैं विनाशकारी भूकंप उत्तराखंड और आसपास का हिमालयी क्षेत्र भारतीय तथा यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर के कारण भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील है। वर्ष 1991 में उत्तरकाशी में लगभग 6.8 तीव्रता और वर्ष 1999 में चमोली में लगभग 6.4 तीव्रता के भूकंप आए थे। इन घटनाओं ने पहाड़ी क्षेत्रों में भवनों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचों की भूकंपरोधी क्षमता की आवश्यकता को रेखांकित किया।

वैज्ञानिक निगरानी और आपदा तैयारी जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के शोध का उद्देश्य संभावित भूकंप के समय की घोषणा करना नहीं, बल्कि धरती के भीतर जमा हो रहे तनाव और उससे जुड़े जोखिमों को बेहतर ढंग से समझना है। उत्तराखंड में भूकंपीय निगरानी बढ़ाना, भवन निर्माण मानकों का पालन करना, अस्पतालों और आपातकालीन सेवाओं की तैयारी मजबूत करना तथा स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाओं का नियमित अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। अध्ययन का संदेश स्पष्ट है—उत्तराखंड के नीचे भूगर्भीय तनाव जमा हो रहा है और क्षेत्र में बड़े भूकंप की क्षमता को गंभीरता से समझने की जरूरत है। लेकिन फिलहाल किसी निश्चित तारीख को महाभूकंप आने की भविष्यवाणी नहीं की गई है।


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