सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : फोन कॉल के दौरान जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल को लेकर एक अहम कानूनी सवाल लंबे समय से चर्चा में रहा है। इसी मुद्दे पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट से जुड़ी एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है, जो भविष्य में ऐसे मामलों की दिशा तय कर सकती है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हर परिस्थिति में फोन पर कही गई जातिसूचक टिप्पणी अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती, बल्कि इसके लिए मामले की परिस्थितियों, मंशा और प्रभाव को देखना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को अपमान, उत्पीड़न और भेदभाव से बचाना है। लेकिन कानून का प्रयोग करते समय यह भी जरूरी है कि आरोप तथ्यों और कानूनी कसौटी पर खरे उतरें। यदि बातचीत निजी है और उसका उद्देश्य सार्वजनिक अपमान या डर पैदा करना नहीं है, तो हर मामले में SC/ST एक्ट की धाराएं स्वतः लागू नहीं होंगी।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल आरोप के आधार पर गिरफ्तारी या कठोर कार्रवाई करना उचित नहीं है। जांच एजेंसियों को सबूत, संदर्भ और शिकायत की प्रकृति को गंभीरता से परखना होगा। यह व्यवस्था एक ओर जहां कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाने की दिशा में अहम मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर यह भी साफ किया गया कि वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाने में कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए।

यह फैसला कानून, पुलिस कार्रवाई और आम नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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