सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : नीट की होड़ के बावजूद एमबीबीएस की 800 से अधिक सीटें खाली

नई दिल्ली। देश में डॉक्टर बनने के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी) की तैयारी करने वाले लाखों विद्यार्थियों के बीच मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने की होड़ रहती है। इसके बावजूद शैक्षणिक सत्र 2026-27 की अंतिम काउंसलिंग प्रक्रिया के बाद देश में एमबीबीएस की 800 से अधिक सीटें खाली रह गई हैं। यह स्थिति मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत और विद्यार्थियों की आर्थिक क्षमता से जुड़ी चुनौतियों को उजागर करती है। रिपोर्टों के अनुसार, नीट-यूजी 2026 की अंतिम स्ट्रे वैकेंसी काउंसलिंग के बाद कुल 837 एमबीबीएस सीटें आवंटित नहीं हो सकीं। इनमें से 824 सीटें तमिलनाडु और पुडुचेरी के 14 डीम्ड मेडिकल विश्वविद्यालयों में हैं। इसके अतिरिक्त एक सीट एम्स मदुरै और 12 सीटें कर्नाटक के कोलार स्थित चेत्तीनाड अस्पताल एवं अनुसंधान संस्थान में खाली रहीं। सालाना लाखों रुपये की फीस बनी बड़ी बाधा खाली सीटों के पीछे प्रमुख कारण निजी डीम्ड विश्वविद्यालयों की ऊंची फीस को माना जा रहा है। तमिलनाडु और पुडुचेरी के कई संस्थानों में एमबीबीएस की सालाना ट्यूशन फीस लगभग 23 लाख से 35 लाख रुपये तक बताई गई है। इसके अतिरिक्त छात्रावास, भोजन, परीक्षा और अन्य खर्च भी विद्यार्थियों के कुल बजट को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में नीट में सफल होने के बावजूद कई परिवारों के लिए निजी मेडिकल कॉलेज की फीस वहन करना मुश्किल हो जाता है। विद्यार्थियों को केवल प्रवेश मिलने की संभावना नहीं, बल्कि साढ़े चार साल के शैक्षणिक पाठ्यक्रम और उसके बाद की इंटर्नशिप तक के खर्च का भी आकलन करना पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल शिक्षा की लागत और परिवारों की आर्थिक क्षमता के बीच अंतर होने से कुछ सीटें खाली रह सकती हैं। हालांकि, केवल रिक्त सीटों के आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर सीट खाली रहने की वजह फीस ही थी। चार कॉलेजों में सबसे अधिक सीटें खाली रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मेडिकल कॉलेजों में रिक्त सीटों की संख्या काफी अधिक रही। श्री सत्य साईं मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, चेन्नई में 188 सीटें खाली रहीं। मीनाक्षी मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, कांचीपुरम में 117 सीटें, महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुडुचेरी में 92 सीटें और श्री बालाजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चेन्नई में 82 सीटें आवंटित नहीं हो सकीं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि मेडिकल शिक्षा की मांग होने के बावजूद महंगी फीस वाले संस्थानों में सभी सीटें भरना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

नीट में सफल होना और कॉलेज की फीस चुका पाना अलग-अलग चुनौतियां नीट-यूजी में सफलता मेडिकल शिक्षा में प्रवेश का पहला चरण है। इसके बाद विद्यार्थियों को अपनी रैंक, आरक्षण श्रेणी, उपलब्ध सीटों, कॉलेज की फीस और काउंसलिंग के नियमों के अनुसार विकल्प चुनने होते हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में कई निजी डीम्ड विश्वविद्यालयों की फीस काफी अधिक होती है। ऐसे में विद्यार्थी बेहतर रैंक होने के बावजूद आर्थिक कारणों से कुछ कॉलेजों में प्रवेश लेने से पीछे हट सकते हैं। वहीं, कुछ संस्थानों में सीटें भरने के लिए अंतिम काउंसलिंग दौर तक प्रवेश प्रक्रिया जारी रहती है। इस साल रिक्त सीटों की स्थिति क्यों चर्चा में है? नीट-यूजी 2026 की परीक्षा प्रक्रिया भी इस वर्ष चर्चा में रही। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रश्नपत्र लीक होने की घटना के बाद परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित की गई थी। तमिलनाडु के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने रिक्त मेडिकल सीटों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से न्यूनतम अर्हता प्रतिशत में संभावित राहत और अतिरिक्त काउंसलिंग दौर पर विचार करने की मांग की थी। यह उनकी मांग है; इसे सरकार का स्वीकृत निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।

क्या खाली सीटों के लिए फिर होगी काउंसलिंग? 800 से अधिक रिक्त सीटों के बाद एक अतिरिक्त काउंसलिंग दौर की संभावना को लेकर चर्चा है। हालांकि, नई काउंसलिंग तभी हो सकेगी, जब संबंधित प्राधिकरण इसकी औपचारिक अनुमति और दिशा-निर्देश जारी करेगा। विद्यार्थियों को केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर यह नहीं मानना चाहिए कि प्रवेश के लिए आवेदन दोबारा खुल गए हैं। उम्मीदवारों को मेडिकल काउंसलिंग कमेटी की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी सूचनाओं और पात्रता संबंधी नियमों पर नजर रखनी चाहिए। मेडिकल शिक्षा की लागत पर उठे सवाल एमबीबीएस की सीटें खाली रहना केवल प्रवेश प्रक्रिया का विषय नहीं है, बल्कि मेडिकल शिक्षा की पहुंच और वहनीयता से भी जुड़ा सवाल है। एक ओर बड़ी संख्या में विद्यार्थी डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं, वहीं दूसरी ओर ऊंची फीस कुछ संस्थानों में उपलब्ध सीटों को विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर कर सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, फीस संरचना, छात्रवृत्ति, शिक्षा ऋण और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की उपलब्धता पर व्यापक विचार जरूरी है, ताकि योग्य विद्यार्थियों को आर्थिक कारणों से अवसरों से वंचित न होना पड़े और उपलब्ध शैक्षणिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके।


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