सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : अफ्रीकी देश केन्या के लामू द्वीप पर 16 अरब डॉलर की विशाल तेल रिफाइनरी परियोजना शुरू होने से स्थानीय लोगों, मछुआरों और पर्यावरण संरक्षण संगठनों की चिंता बढ़ गई है। हिंद महासागर के तट पर स्थित लामू अपनी खूबसूरत समुद्री तटरेखाओं, पारंपरिक नौकाओं, मछली पकड़ने के कारोबार और ऐतिहासिक संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां के हजारों लोगों की आजीविका मछली पकड़ने और पर्यटन पर निर्भर है। अब इस क्षेत्र में विशाल तेल रिफाइनरी बनाने की योजना से समुद्री पारिस्थितिकी और स्थानीय रोजगार पर संभावित असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

नाइजीरिया के उद्योगपति अलिको डांगोटे की कंपनी इस परियोजना को विकसित कर रही है। 30 सितंबर 2026 को परियोजना का शिलान्यास किया गया। प्रस्तावित रिफाइनरी की क्षमता प्रतिदिन लगभग सात लाख बैरल होगी और इसे 2030 तक चालू करने का लक्ष्य रखा गया है। केन्या सरकार का मानना है कि इससे ईंधन के आयात पर निर्भरता कम होगी, औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

हालांकि, पर्यावरण संगठनों और स्थानीय निवासियों को आशंका है कि निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों से मैंग्रोव वन, प्रवाल भित्तियों, समुद्री जीवों और मछलियों के प्रजनन क्षेत्रों को नुकसान पहुंच सकता है। इससे मछुआरों की आय और पर्यटन व्यवसाय प्रभावित होने की चिंता भी जताई गई है। लामू का ऐतिहासिक पुराना शहर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है, इसलिए इस परियोजना के सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर भी सवाल उठ रहे हैं।

परियोजना को लेकर स्थानीय निवासियों ने भूमि अधिकारों और मुआवजे से संबंधित चिंताएं भी उठाई हैं। कुछ लोगों ने अदालत का रुख किया है। ऐसे में लामू के सामने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। आने वाले समय में पर्यावरणीय आकलन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और कानूनी प्रक्रिया इस परियोजना के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होंगे।


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